मक्का में पोषक तत्वों की कमी के लक्षण और उपचार
(सभी तस्वीरें- हलधर)मक्का की फसल में लक्षणों के आधार पर पोषक तत्वों की न्यूनता को पहचानना कठिन हो जाता है। क्योंकि, विपरीत वातावरण, रोग कीट आदि से उत्पन्न होने वाली व्याधियों के कुछ लक्षण पोषक तत्वों की कमी से मिलते जुलते होते हैं। ऐसे में किसान खेत में फसल की निगरानी करें। साथ ही, फसल पर उभरे लक्षणों के आधार पर पोषक तत्वों की न्यूनता को पादप विश्लेषण, रासायनिक ऊतक परीक्षण अथवा मृदा परीक्षण के आधार पर पूर्ति करें।
नाइट्रोजन की कमी
नाइट्रोजन की कमी से पत्तियाँ छोटी और हल्के रंग की हो जाती हैं। पीलापन पत्तियों के सिरे की ओर से प्रारंभ होकर V आकार बनाता है। पत्तियाँ नीचे की तरफ सूखकर मटमैले रंग की हो जाती हैं और सूखापन धीरे-धीरे ऊपर की तरफ बढ़ता है। सूखा पड़ने के लक्षण बलुई मिट्टी में बढ़ सकते हैं।
नियंत्रण:- यदि आवश्यक मात्रा में उर्वरक कम प्रयोग किया गया है तो उस समय तक प्रतीक्षा करनी चाहिए। जब तक कि मौसम कुछ साफ होकर कुछ गरम न हो जाये। इससे नाइट्रोजन पौधों को मिल जायेगा। यदि नाइट्रोजन की कमी है तो यूरिया पौधों के साथ पंक्ति में डालना चाहिए। इससे पौधे शीघ्र ही पुनः हरे हो जायेंगे।
फॉस्फोरस की कमी
फॉस्फोरस की कमी से पौधों की पत्तियाँ गहरे हरे रंग की हो जाती हैं। पत्तियों के सिरे और किनारे लाल हो जाते हैं। पौधे की वृद्धि धीमी पड़ जाती है और इनकी जड़ें कम निकलती हैं।
नियंत्रण:- यदि मृदा परीक्षण द्वारा खेत में फॉस्फोरस की उचित मात्रा पायी गयी है, तो शुष्क और गर्म मौसम की प्रतीक्षा करनी चाहिए। बुवाई के समय यदि फॉस्फेट्स की मात्रा नहीं दी गयी तो 40-60 किलोग्राम फॉस्फोरस प्रति हेक्टेयर के हिसाब से पौधों के साथ पंक्ति में में दिया जा सकता है।
पोटेशियम की कमी
पोटाश की कमी से पौधा और उसकी गांठ छोटी रह जाती है। नीचे की पत्तियों के किनारे शुरू में पीले और बाद में गहरे भूरे रंग के होकर सूखने लगते हैं। इसे उपरान्त झुलसन कहते हैं।
नियंत्रण:- पोटेशियम की कमी को अगले वर्ष दूर करने की योजना बनानी चाहिए। जबकि, 18 इंच के पौधों में यह लक्षण दिखायी दे तो 40-60 किलोग्राम पोटेशियम ऑक्साइड प्रति हेक्टेयर की दर से पंक्तियों में दिया जा सकता है।
जस्ता की कमी
शुरू में पत्तियों पर हल्की धारियाँ पायी जाती हैं जो बाद में सफेद अथवा पीली पत्तियों में बदल जाती हैं। यह पत्तियाँ, पत्ती के बीच से लेकर आधार तक प्रायः पूरी चौड़ाई में होती हैं। इसलिए इसे श्वेत कलिका रोग कहते हैं।
नियंत्रण:- जिंक की कमी होने पर 2.5 किलोग्राम जिंक सल्फेट और 5 किग्रा. यूरिया के छिड़काव से इसकी कमी को दूर किया जा सकता है। नई पत्तियों में शीघ्र हरा रंग पैदा हो जाता है।
मैग्नीशियम की कमी
मैग्नीशियम की कमी से पौधों की नीचे वाली पत्तियों में सफेद अथवा पीली धारियाँ पैदा हो जाती हैं। यह धारियाँ शिराओं के बीच में फैल सकती हैं। किन्तु शिरायें हरी बनी रहती हैं। बाद में पुरानी पत्तियाँ लाल हो जाती हैं और अधिक की अवस्था में सिरे और किनारे मर भी सकते हैं। छोटी पौधे में ऊपर की सभी पत्तियाँ पीली पड़ जाती हैं।
नियंत्रण:- 10 किलोग्राम मैग्नीशियम सल्फेट 100 गैलन पानी में पत्तियों पर छिड़काव करने से भी पौधों को पर्याप्त मैग्नीशियम मिल जाता है।
कैल्शियम की कमी
मक्का में कैल्शियम की कमी प्रायः कम ही दिखायी देती है। ऐसे पौधों की पत्तियाँ ठीक से खुल नहीं पातीं और सीढ़ी के समान एक दूसरे से लिपटी रहती हैं। रोग ग्रस्त पौधों की पत्तियाँ पीले हरे रंग की हो जाती हैं।
गन्धक की कमी
गन्धक की कमी से पौधों में बौनेपन के लक्षण पाये जाते हैं। ऐसे पौधों में सामान्य रूप से पीलेपन के लक्षण भी पाये जाते हैं और ऐसे पौधे देर से परिपक्व होते हैं। पीलापन नाइट्रोजन की अपेक्षा नई पत्तियों में अधिक होता है।
लोह की कमी
पौधे की नई पत्तियाँ शिराओं के बीच में और किनारों पर पीले हरे से सफेद रंग की होती हैं। यह लक्षण क्षारीय मृदा को छोड़कर अन्य दशाओं में प्रायः बहुत कम दिखायी पड़ते हैं। मक्का में लोह की आवश्यकता कम होती है।
मैग्नीज की कमी
मक्का में कम मैग्नीज की आवश्यकता के कारण इसके लक्षण अस्पष्ट होते हैं। पत्तियाँ गहरे रंग की और थोड़ा धारीयुक्त हो जाती हैं। उस अवस्था में पत्तियों में सफेद धारियाँ दिखायी पड़ती हैं। जिसका मध्य भाग भूरा पड़ जाता है।
ताँबा की कमी
ताँबे की कमी से पत्तियाँ पहले पीली पड़ती हैं। उग्र रूप से न्यूनतायुक्त पौधे पोटेशियम के समान बौने रह जाते हैं, नई पत्तियाँ पीली हो जाती हैं। अपेक्षाकृत पुरानी पत्तियों में शीर्षरश्मी क्षय हो जाती है। बलित पौधों के तने मृद और लचीले हो जाते हैं।
बोरोन की कमी
मक्का में पोषक की कमी के लक्षण बहुत ही कम अवस्थाओं में देखे गये हैं। शुरू के पौधों की नई पत्तियों पर शिराओं के बीच में सफेद, अनियंत्रित आकार के धब्बे पाये जाते हैं। यह धब्बे आपस में मिलकर सफेद धारी का रूप ले लेते हैं। इन पौधों की पत्तियों की लम्बाई नहीं बढ़ती।
जिंक की कमी
नई पत्तियों के निचले आधे भाग पर सफेद अथवा पीले रंग की धारिय अथवा पट्टियाँ बनती हैं (सफेद कलिका रोग)। पौधों की बढ़वार रुक जाती है।