मूंग में जिंक की कमी से घट सकती है पैदावार, जानिए बचाव

नई दिल्ली 10-Oct-2026 04:12 PM

मूंग में जिंक की कमी से घट सकती है पैदावार, जानिए बचाव

(सभी तस्वीरें- हलधर)

मृदा में उपलब्ध जिंक की कमी होने पर पौधों की वृद्धि, उत्पादकता और दानों की पोषण गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। इसलिए मूंग में जिंक का उचित प्रबंधन फसल उत्पादन और पोषण सुरक्षा दोनों की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। जिंक प्रबंधन के लिए मृदा में जिंक उर्वरकों का प्रयोग, पर्णीय छिड़काव, बीज प्राइमिंग और बीज कोटिंग जैसी विधियां अपनाई जा सकती हैं। हाल के अध्ययनों से पता चला है कि जिंक की उचित मात्रा और विधि से प्रयोग करने पर मूंग के दानों में जिंक की सांद्रता और फसल की उत्पादकता में सुधार किया जा सकता है।

मूंग में जिंक की कमी

मृदा में जिंक की कमी फसल की उत्पादकता और पोषण गुणवत्ता को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण कारणों में से एक है। जिंक की उपलब्धता सूक्ष्म पीएच, कार्बनिक पदार्थ, मृदा बनावट, चूने की मात्रा, नमी और अन्य पोषक तत्वों के साथ पारस्परिक क्रियाओं से प्रभावित होती है। जिंक की कमी की स्थिति में पौधों की वृद्धि और विकास प्रभावित हो सकती है। इसलिए जिंक प्रबंधन के लिए खेत की वास्तविक जिंक स्थिति का आकलन करना आवश्यक है। मृदा परीक्षण के आधार पर जिंक की आवश्यकता निर्धारित करना अधिक वैज्ञानिक और आर्थिक दृष्टिकोण है।

जिंक का सफल उपयोग

मृदा परीक्षण के आधार पर जिंक की आवश्यकता निर्धारित करें। जिंक का उपयुक्त स्रोत चुनें। अनुशंसित मात्रा का ही प्रयोग करें। उर्वरक को मिट्टी में समान रूप से मिलाएं। जैविक खाद एवं अन्य पोषक तत्वों के साथ संतुलित प्रबंधन अपनाएं।

जिंक उर्वरकों के प्रमुख स्रोत

मूंग में जिंक की कमी दूर करने के लिए विभिन्न जिंक युक्त उर्वरकों का उपयोग किया जा सकता है। इनमें जिंक सल्फेट, जिंक ऑक्साइड और विभिन्न जिंक युक्त स्रोत शामिल हैं।

जिंक उर्वरक

जिंक प्रतिशत

जिंक सल्फेट मोनोहाइड्रेट

    36

जिंक सल्फेट हेप्टाहाइड्रेट

     21

जिंक ऑक्सीसल्फेट

   20-50

बेसिक जिंक सल्फेट

    55

जिंक कार्बोनेट

   50-56

जिंक ऑक्साइड

   50-80

जिंक क्लोराइड

     50

जिंक नाइट्रेट

     23

जिंक फास्फेट

     50

अमोनिया युक्त जिंक

    10

डाइसोडियम जिंक ईडीटीए

    8-14

सोडियम जिंक एचईडीटीए

    6-10

सोडियम जिंक ईडीटीए

    9-13

(नोट: तालिका में जिंक सल्फेट हेप्टाहाइड्रेट का प्रतिशत 21 दिया गया है)

मृदा में जिंक का प्रयोग

जिंक की कमी वाली मिट्टी में जिंक उर्वरक को मृदा में देना जिंक प्रबंधन की प्रमुख विधियों में से एक है। जिंक सल्फेट का उपयोग सामान्यतः किया जाता है। हालांकि, जिंक की वास्तविक मात्रा मृदा परीक्षण, जिंक स्रोत और स्थानीय कृषि विश्वविद्यालय/कृषि विभाग की अनुशंसा के आधार पर निर्धारित की जानी चाहिए।

मूंग पर किए गए हालिया शोध ने मृदा में जिंक के प्रयोग से फसल की उपज में सुधार और जिंक के उपयोग से संबंधित सकारात्मक परिणाम प्राप्त हुए हैं। उमर ईटी ओल-2023 ने मूंग में मृदा द्वारा जिंक के प्रयोग का अध्ययन किया और पाया कि जिंक के प्रयोग से उपज प्रदर्शन में सुधार हुआ; जबकि, पर्णीय प्रयोग ने दाने में जिंक की मात्रा बढ़ाने में महत्वपूर्ण प्रभाव दिखाया।

पर्णीय छिड़काव

पर्णीय जिंक प्रयोग से पौधों की पत्तियों द्वारा जिंक का प्रत्यक्ष अवशोषण संभव होता है और यह जिंक की कमी को शीघ्र दूर करने की एक उपयोगी विधि हो सकती है।

बीज प्राइमिंग

बीज प्राइमिंग जिंक जैव-पोषण संवर्धन की एक महत्वपूर्ण तकनीक है। इसमें बीजों को जिंक युक्त घोल में निर्धारित समय तक रखा जाता है, जिससे बीज में जिंक की उपलब्धता बढ़ती है। अंकुरण और प्रारंभिक पौधा वृद्धि के दौरान जिंक की आपूर्ति बेहतर हो सकती है।

बीज कोटिंग

बीज कोटिंग में जिंक युक्त सामग्री को किसी उपयुक्त गोंद की सहायता से बीज की सतह पर लगाया जाता है। इसका उद्देश्य अंकुरण के प्रारंभिक चरण में जिंक की उपलब्धता सुनिश्चित करना है। हालांकि, बीज कोटिंग की मात्रा को सीधे सभी परिस्थितियों में समान नहीं माना जाना चाहिए। जिंक स्रोत, बीज की गुणवत्ता और गोंद के अनुसार अनुशंसित मात्रा अलग हो सकती है।

नैनो जिंक उर्वरक

नैनो जिंक उर्वरक सूक्ष्म पोषक तत्व प्रबंधन की अगली नई तकनीक है। नैनो आकार के पदार्थों के विशिष्ट भौतिक-रासायनिक गुणों के कारण कम मात्रा में पोषक तत्व उपलब्ध कराने और उपयोग दक्षता बढ़ाने की संभावना का अध्ययन किया जा रहा है।

सरिता कुमारी, जितेंद्र कुमार जाट, सरदार कृषिनगर दांतीवाड़ा कृषि विश्वविद्यालय, सरदारनगर, गुजरात


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