आईआईएफएसआर का अनूठा मॉडल, गन्ने के साथ मूंगफली से अतिरिक्त आमदनी 

नई दिल्ली 31-Aug-2026 01:58 PM

आईआईएफएसआर का अनूठा मॉडल, गन्ने के साथ मूंगफली से अतिरिक्त आमदनी 

(सभी तस्वीरें- हलधर)

पीयूष शर्मा
जयपुर। गन्ने के खेत से तेल को धार...। शीर्षक  पढक़र चौकिए नहीं। क्योंकि, सच यही है। देश को खाद्य तेल में आत्मनिर्भर बनाने के लिए अब ऐसे प्रयास मैदान लेने लगे है। क्योंकि, जमीन भी सीमित है और पानी भी। इस स्थिति को देखते हुए कृषि वैज्ञानिक एक ही खेत में एक साथ अलग-अलग फसलों की कुंड़ली मिलाने में जुटे हुए है। ताकि, किसान को भी लाभ हो। साथ ही, उर्वरक, पानी और जमीन की भी बचत हो। वैसे तो गन्ना और मूंगफली की फसल का दूर तक नाता नहीं है। लेकिन, इन फसलों को एक-दूसरे से जोडऩे का काम किया है आईसीएआर-भारतीय कृषि प्रणाली अनुसंधान संस्थान मोदीपुरम ने। यहां के वैज्ञानिक संस्थागत परीक्षण परिणामों के किसानों को सहफसली खेती के लिए प्रोत्साहित कर रहे है। वैज्ञानिको का कहना है कि इस फसल मॉडल में किसान को मूंगफली उत्पादन के लिए केवल बीज खरीद की जरूरत होती हे। शेष आदान की पूर्ति गन्ने की फसल को दिए जाने वाले आदान से हो जाती है। जब फसल तैयार होती है तो किसान को अतिरिक्त आमदनी मिल जाती है। गौरतलब है कि मूंगफली का उत्पादन राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश तक सीमित है। लेकिन, आसाम राज्य में सरसों की तर्ज पर पूर्वी उत्तरप्रदेश मेें मूंगफली की खेती को प्रोत्साहित किया जा रहा है। हालांकि, यहां कारोबारियों और किसानों की पंसद कुछ अलग है। क्योंकि, यहां पर बोल्ड दाने वाली मूंगफली को पंसद किया जाता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि सरकार का जोर फसल विविधकरण पर है। ऐसे में खेती का यह मॉडल निकट भविष्य में किसानों के लिए लाभकारी साबित होगा। गौरतलब है कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा गन्ना उत्पादक देश है। 

यह है लाभ

संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. रघुवीर सिंह ने बताया कि गन्ना फसल के साथ मूंगफली उत्पादन से कई लाभ है। इससे किसान को अतिरिक्त आय मिल रही है। वहीं, जमीन को नाइट्रोजन, पशुओं को चारा भी उपलब्ध होता है। बड़ी बात यह है कि इस फसल को ना तो नील गाय खाती है और ना ही आवारा पशु नुकसान पहुंचाते है। 

केवल बीज की जरूरत

उन्होंने बताया कि गन्ने के साथ मूंगफली की मिश्रित खेती में किसानों को केवल बीज की जरूरत होती है। वह भी आधे से थोड़े बीज की। फिर, फसल तैयार होने तक किसान को ना तो आदान देने की जरूरत है और ना ही सिंचाई की। क्योंकि, यह फसल गन्ने को दिए जाने वाले आदान से तैयार हो जाती है। 

ऐसे बैठाया गन्ना-मूंगफली का तालमेल 

उन्होंने बताया कि गन्ने की बुवाई 20 फरवरी से 10 मार्च तक की जाती है। गन्ने की बुवाई पेड्रो तरीके से की जाती है। दो-तीन लाइन के मध्य एक लाइन में मूंगफली बुवाई की जाती है। इस तरह दो लाइन के मध्य करीब 5 फीट का अंतर आ जाता है। मूंगफली के लिए वैसे तो प्रति हैक्टयर 100 किलोग्राम बीज की जरूरत होती है। लेकिन, इस विधि में 55-60 किलोग्राम बीज पर्याप्त रहता है। 100-105 दिन में तैयार होने वाली मूंगफली किस्म का चयन किया जाता है। गन्ना बढ़ा होने तक फसल पककर तैयार हो जाती है। 

12 क्विंटल तक उपज

उन्होने बताया कि मैदानी परीक्षण में मंूगफली का उत्पादन 12 क्विंटल प्रति प्रति हैक्टयर तक मिल रहा है। जबकि, गन्ने की उपज 900-1000 क्विंटल तक। उन्होने बताया कि आदान बचत के लिए गन्ने के खेत को पानी से लबालब नहीं किया जाता है। पानी नाली बनाकर दिया जाता है। वहीं, खेत तैयार करते समय जो उर्वरक गन्ने के लिए उपयोग लिए जाते है, उससे मूंगफली की फसल भी अपनी जरूरत पूरी कर लेती है। बता दें कि सालाना खाद्य तेल आयात पर दो लाख करोड़ से ज्यादा खर्च हो रहे है।


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