सरसों की पैदावार बढ़ाने के वैज्ञानिक तरीके, किसान इन बातों का रखें ध्यान

नई दिल्ली 03-Oct-2026 12:53 PM

सरसों की पैदावार बढ़ाने के वैज्ञानिक तरीके, किसान इन बातों का रखें ध्यान

(सभी तस्वीरें- हलधर)

राई-सरसों वर्षा आधारित क्षेत्रों के लघु-सीमांत किसानों के लिए आय का मुख्य जरिया है। राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पश्चिम बंगाल, झारखंड, असम और गुजरात देश के प्रमुख सरसों उत्पादक राज्य हैं। इन राज्यों में सरसों का अधिकतम उत्पादन 92 प्रतिशत और क्षेत्रफल में 94 फीसदी का योगदान है। कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना में भी उत्पादन क्षेत्र का विस्तार किया जा रहा है। नई प्रजातियों और तकनीकों के चलते दशक में अधिकतम बढ़कर उत्पादन 9.26 मिलियन टन और उत्पादकता 1511 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर (2018-19) हो गई है। यह फसल कम सिंचाई और लागत में तैयार होकर ज्यादा लाभ देती है। वैज्ञानिक शोध से पता चला है कि उन्नतशील सस्य विधियों को अपना कर अपने देश में भी 25 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर सरसों की पैदावार आसानी से ली जा सकती है। उत्तम गुणवत्ता के बीज उत्पादन करने के लिए बेहतर तकनीकों जैसे अनुशंसित कृषक क्रियाएं, खरपतवार, रोग-कीट के नियंत्रण के तरीके, सिंचाई-उर्वरक की अनुकूल मात्रा आदि का प्रयोग आवश्यक है।

भूमि की तैयारी: जमीन का पी. एच. मान 7 हो। लवणीय पानी भराव वाले खेतों में हर साल ढैंचा को हरी खाद के रूप में उगाएं। क्षारीय भूमि में प्रति तीन वर्ष 5 टन प्रति हेक्टेयर जिप्सम का प्रयोग करें। जिप्सम को मई-जून में मृदा में मिला दें। सिंचित क्षेत्रों में पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से और उसके बाद तीन-चार जुताइयां कल्टीवेटर से करनी चाहिए। सिंचित क्षेत्र में जुताई करने के बाद खेत में पाटा लगाना चाहिए। अंतिम जुताई के समय 1.5 प्रतिशत क्यूनॉलफॉस 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से मिट्टी में मिला दें।

बीज दर: 3-5 किग्रा. प्रति हेक्टेयर

बुवाई समय: मध्य सितंबर से अक्टूबर

बीजोपचार: कारबेन्डाजिम (बाविस्टिन) 2 ग्राम अथवा पूर्व में सफेद रोली रोग आया हो तो एप्रोन 35 एस डी 6 ग्राम प्रति किग्रा. बीज। मृदाजनित रोगों से बचाव हेतु 10 ग्राम ट्राइकोडर्मा प्रति किलो बीज की दर से बीजोपचार करें।

मिश्रित खेती: बारानी चने के साथ सिंचित खेती करने से अधिक लाभ मिलता है। इससे फसल को फल नहीं मारता है। कीटनाशी छिड़काव भी आसानी से किया जा सकता है। सरसों-चने को अंतः फसल 7:3 की पंक्ति के अनुपात में बोएं।

जैविक खाद: 8-10 टन प्रति हेक्टेयर (सिंचित क्षेत्र), 4-5 टन (असिंचित क्षेत्र) सड़ी गोबर की खाद बुवाई के एक माह पूर्व खेत में डालकर जुताई करें। हरी खाद का भी प्रयोग इस फसल से पहले किया जा सकता है। सिंचित और बारानी दोनों प्रकार के क्षेत्रों में स्फुर घोलक जीवाणु (पी.एस.बी.) खाद (10-15 ग्राम प्रति 1 किलो बीज) और एज़ोटोबैक्टर से बीजोपचार भी लाभदायक रहता है। इससे नाइट्रोजन और फास्फोरस की उपलब्धता बढ़ती है और उपज में वृद्धि होती है।

उर्वरक:

  • असिंचित फसल: 40-60 किग्रा नत्रजन, 20-30 किग्रा फास्फोरस, 20 किलोग्राम पोटाश और सल्फर प्रति हेक्टेयर।

  • सिंचित फसल: 80-120 किग्रा नत्रजन, 50-60 किग्रा फास्फोरस, 20-40 किग्रा पोटाश और सल्फर प्रति हेक्टेयर।

नत्रजन की पूर्ति अमोनियम सल्फेट द्वारा करना बस लाभदायक होता है। क्योंकि, इसमें गंधक भी उपलब्ध रहता है। सिंचित स्थितियों में नत्रजन की आधी मात्रा, फास्फोरस, पोटाश और सल्फर की पूरी मात्रा को बुवाई के समय, बीज से कम से कम 5 सेमी. नीचे बुवाई करनी चाहिए। (शेष आधी नत्रजन को पहली सिंचाई करने के बाद खेत में जब पैर चिपचिपाहट न हों तब छिड़ककर (टॉप ड्रेसिंग) चाहिए। असिंचित फसल में सभी पोषक तत्वों की पूरी मात्रा को बुवाई के समय ही डाला जाता है।)

सूक्ष्म पोषक तत्व: बुवाई से पहले 25 किलो जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर। इसका उपयोग 0.5 प्रतिशत जिंक सल्फेट और 0.25 प्रतिशत बुझे हुए चूने (200 लीटर पानी में 1 किलोग्राम जिंक सल्फेट अथवा किलोग्राम बुझे हुए चूने) का घोल बनाकर छिड़काव कर पौधे की 30 दिन की अवस्था से 15 दिन के अंतराल पर 2 छिड़काव करें। बोरोन की कमी वाली मृदाओं में 10 किलोग्राम बोरेक्स प्रति हेक्टेयर की दर से खेतों में बुवाई से पूर्व मिला दें। सरसों की फसल में थायोयूरिया के दो पर्णीय छिड़काव उपयुक्त पाए गए हैं। थायोयूरिया का 0.1 प्रतिशत घोल (500 लीटर पानी में 500 ग्राम थायोयूरिया) तैयार कर पहला छिड़काव फूल आने के समय (बुवाई के 50 दिन बाद) और दूसरा छिड़काव फलियां बनने के समय करना चाहिए।


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