अरावली खतरे में: खनन नहीं रुका तो भारत की खाद्य सुरक्षा डूबेगी
(सभी तस्वीरें- हलधर)वर्ष 2021 की हॉलीवुड व्यंग्य फि ल्म डोंट लुक अप में, दो अमेरिकी खगोलशास्त्री दुनिया को एक धूमकेतु के बारे में चेतावनी देते हैं, जो पृथ्वी की ओर तेज़ी से बढ़ रहा है। हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति एक अरबपति के झांसे में आ जाते हैं, जो यह दावा करता है कि उस आकाशीय पिंड में खरबों डॉलर के दुर्लभ तत्व हैं। आखिरकार, धूमकेतु पृथ्वी से टकराता है, जिससे एक वैश्विक आपदा बनती है। काश! फिल्म के मुख्य किरदारों ने प्राकृतिक संसाधनों की लूट के भयानक परिणामों के बारे में संज्ञान लिया होता, जैसा कि उत्तर भारत के हरे फेफ डे पुकारी जाने वाली और पर्यावरण सुरक्षा के लिए अति संवेदनशील किंतु क्षतिग्रस्त की जा चुकी अरावली पर्वत शृंखला की प्रस्तावित 100 मीटर की परिभाषा से साफ था तो फिल्म का शीर्षक डोंट लुक अप, लुक डाउन होता। यह वही हैए, जिसकी चेतावनी महात्मा गांधी ने यह कहकर दी थी, दुनिया में हर किसी की ज़रूरत के लिए काफ ी है। लेकिन , हर किसी के लालच के लिए नहीं।
कई साल पहले, मैं हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले में गोविंद सागर जलाशय के ऊपर हिमालय की नाजुक पहाडयि़ों में चूना पत्थर की खुदाई पर रिर्पोटिंग करने गया था। एक सीमेंट कंपनी धीरे-धीरेए परत दर परत, चूना पत्थर वाली पहाड़ी को खुरच रही थी। जब मैंने कंपनी के महाप्रबंधक से पूछा कि क्या उन्हें अहसास है कि पहाड़ी को समतल करने से गंभीर पारिस्थितिक नुकसान होगा, तो उनके जवाब में आमतौर पर हावी मानसिकता झलक रही थी। जब पहाड़ी ही नहीं रहेगी तो आप किस पारिस्थितिक नुकसान की बात कर रहे हैं।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि प्राकृतिक संसाधनों के दोहन पर आधारित सभी विकास गतिविधियां बंद कर देनी चाहिए। इसका अर्थ सिर्फ यह है कि मुख्य आवश्यक तत्वों के अत्यधिक खनन के गंभीर पर्यावरणीय परिणाम होते हैं और इसके लिए सख्त नियमों के अलावा प्रकृति द्वारा प्रदत्त पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं के आर्थिक मूल्यांकन की भी ज़रूरत है। इसके सामाजिक प्रभाव भी होते हैंए जिनके लिए कोई माप-सूत्र मौजूद नहीं है। ऐसे में, अगर नीति निर्माताओं को गलती करनी भी पड़े, तो उन्हें लोगों और पर्यावरण के हित में गलती करनी चाहिए। इसी तरह, जब हिमालय के ग्लेशियर पिघलने लगेए तब एक ऐसा कथानक गढऩे की कोशिश की गई जो उन दावों को चुनौती दे रहा था, जिसमें इस घटनाक्रम को जलवायु आपदा बताया गया था। भगवान का शुक्र है कि अब दुनिया पिघलते ग्लेशियरों के विनाशकारी परिणामों के प्रति जाग गई है। ग्लोबल वार्मिंग से आगे बढ़कर, दुनिया पहले ही ग्लोबल बॉइलिंग स्टेज में प्रवेश कर चुकी है।


इससे तेज़ गर्म हवा, बार-बार धूल भरी आंधियां, बढ़ते तापमान का रास्ता खुल जाएगा। इसके साथ खेती के कारण गहरे जमीनी पानी के खत्म होने से मिट्टी का कटाव और तेज होगा। जिससे कृषि भूमि की गुणवत्ता खराब हो जाएगी। जहां अरावली को लेकर प्रस्तावित नए मानकों पर बहस खनन और पर्यावरण पर केंद्रित है। वहीं लंबी अवधि की खाद्य सुरक्षा के लिए उभरता खतरा नजऱअंदाज़ किया जा रहा है। मरुस्थलीकरण से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र अधिवेशन ने चेतावनी दी है कि मरुस्थलीकरण मिट्टी की उर्वरता को गंभीर नुकसान पहुंचाता है। जिससे उपजाऊ ज़मीनें अद्र्ध शुष्क हो जाती हैं। निश्चित रूप से, मरुस्थलीकरण इतना गंभीर मुद्दा है कि इसे सिर्फ दावों और वादों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। एक नई प्रबंधन योजना को लागू करने और मज़बूत सुरक्षा के वादे अब पर्याप्त सुरक्षा उपाय नहीं हैं। नि:संदेह: अरावली की पहाडियां महज रणनीतिक खनिजों के लिए एक प्राकृतिक भंडार नहीं हैं। वे बड़े पैमाने पर पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएं भी प्रदान करती हैं। प्रकृति प्रदत्त इन पारिस्थितिक और पर्यावरणीय सेवाओं की वास्तविक आर्थिक लागत का पता नहीं लगाया गया है। एक बार जब यह मोल पता चल जाएगाए तो राष्ट्र को पहाडिय़ों को बरकरार रखने की आर्थिक आवश्यकता का अहसास होगा। भले ही खनिजों को निकालने की आर्थिक लागत पर ज़्यादा जोर दिया जाता है। द इकोनॉमिक्स ऑफ इकोसिस्टम सर्विसेज ऑफ बायोडायवर्सिटी के मानदंडों के अनुसार अगर राष्ट्रीय लेखा-जोखा में धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण कैलास पर्वत और डल झील को आर्थिक मूल्य दिया जा सकता है, तो दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत शृंखलाओं में से एक अरावली के लिए भीए इसी प्रकार का लागत-लाभ विश्लेषण किया जाना चाहिए।