अरावली धरोहर संकट में: नई परिभाषा से जल जंगल जमीन पर खतरा
(सभी तस्वीरें- हलधर)अरावली पर्वतमाला जो भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है जल पुनर्भरण जलवायु विनियमन और वन्यजीव आवास जैसी महत्वपूर्ण पारिस्थितिक सेवाएँ प्रदान करती है। गुजरात से लेकर दिल्ली तक लगभग 700 किमी लंबी यह पर्वतमाला पश्चिमी भारत के पर्यावरण, जलवायु और पारिस्थितिक संतुलन की अनमोल धरोहर मानी जाती है। राजस्थान के शुष्क क्षेत्रों में यह प्राकृतिक हरित ढाल का कार्य करती है और मरुस्थलीकरण को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। राजस्थान वन सांख्यिकी 2023 के अनुसार राज्य में कुल भौगिलिक क्षेत्र के 9.60 प्रतिशत पर वन है। इसमे से ज्यादा वन उन जिलों में ज्यादा है। जहाँ अरावली के पहाड है । सिरोही, उदयपुर, राजसमन्द, अजमेर, जयपुर, दौसा, अलवर, टोंक, भीलवाडा, डूंगरपुर, चितौडगढ, सवाईमाधोपुर, बूंदी के कुछ हिस्सों में भी अरावली का प्रभाव है । राजस्थान में कई प्रसिद्ध वन अभयारण्य और राष्ट्रीय उद्यान हैं, जो अरावली की पर्वतमाला द्वारा सरंक्षित है जिनमें बाघों के लिए रणथंभौर और सरिस्का और तेंदुए और दूसरे वन्यजीवों के लिए माउंट आबू, कुंभलगढ़, मुकुंदरा हिल्स, सीतामाता और जवाई बांध क्षेत्र प्रमुख हैं। इन अभयारण्यों में बाघए तेंदुआ, चीतल, नीलगाय, काला हिरण, भालू और कई प्रकार के पक्षी जैसे मोर, सारस, पेंटेड स्टॉर्क आदि निवास करते हैं। अरावली की नई परिभाषा से इन जीवों का निवास प्रभावित होगा और समय के साथ ये सभी लुप्त हो जायेगें । जिससे हमारा पारिस्थि तंत्र नष्ट हो जायेगा। आदिवासी समुदायों का अरावली संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान है। अरावली क्षेत्र के आदिवासी मुख्यत: वनोपज संग्रह, वर्षा आधारित खेती और पशुपालन पर निर्भर हैं। वह सदियों से जल, जंगल और जमीन को पवित्र मानकर उनका सतत प्रबंधन करते आए हैं। वो पहाडों को अपना देवता मान कर उसकी पूजा करते है। उनका जीवन, उनकी आत्मा पहाड के हर एक पत्थर, उन पत्थरों में बहते पानी, वृक्ष, हवा और हर जंगली जानवर से जुड़ा हुआ है । यह सभी आदिवासियों के अराध्य देवी देवता है ।

इनकी पूजा से ही दिन की शुरुवात होती है। अरावली पहाडिय़ों की नई परिभाषा तय करने के लिए पर्यावरण मंत्रालय के सचिव की अध्यक्षता में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर 9 मई 2024 को एक बहुएजेंसी विशेषज्ञ समिति बनाई गई थी। जिसमें दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात के वन सचिव शामिल थे। जिसने 100 मीटर की ऊंचाई और चट्टानों की उम्र (1 अरब वर्ष या उससे अधिक) के आधार पर परिभाषा का प्रस्ताव रखा,, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर 2025 को इस नई परिभाषा को मंज़ूरी दे है। अरावली की परिभाषा से सब कुछ बदल जायेगा। इसका सबसे ज्यादा प्रभाव राजस्थान में होगा। क्योकि, 80 प्रतिशत अरावली राजस्थान में है। 90 प्रतिशत अरावली क्षेत्र खनन और निर्माण गतिविधियों के लिए खुल सकता है और आने वाले समय में राजस्थान में पर्यावरण को गंभीर नुकसान हो सकता है। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में यह परिभाषा अरावली के पारिस्थितिक संतुलन और वन्यजीवों के आवास को खतरे में डालेगी। इस परिभाषा से कई जीवों के विलुप्त होने का खतरा मंडरा सकता है। अभी तक राज्य सरकार राज्य की अदालत के आदेश से अरावली को बचा रही थी। लेकिन, अब नहीं बचा पायेगी। इसके दूरगामी प्रभाव होंगे। जिसका कोई अंदाजा नहीं है। आदिवायों के छोटे छोटे खेत खत्म हो जायेंगे।
वर्षो से वन में काबिज आदिवासियों को वनाधिकार कानून, 2006 के अंतर्गत व्यक्तिगत और सामुदायिक अधिकारों को मान्यता दिलाने में अड़चनें बढ जाएगी। रेगिस्तान का विस्तार बढ़ जायेगा। खुबसूरत पर्यटन क्षेत्र प्रभावित होगा। जल स्तर घट जायेगा , कई नदियों को उदमग स्थल प्रभावित होगा। झरने खत्म हो जायेंगे। छोटे-छोटे नाले नष्ट हो जायेंगे। कई जंगली जानवरों, पक्षियों और वनस्पति की प्रजातियाँ धीरे धीरे नष्ट हो जाएगी। मानसून और मौसम प्रभावित होगा। कोर्ट द्वारा आरावली की नई परिभाषा केवल एक कानूनी अथवा तकनीकी बदलाव नहीं है। बल्कि , यह आदिवासी जीवन, आजीविका, संस्कृति और अधिकारों से जुड़ा गंभीर सामाजिक मुद्दा है। आवश्यक है कि आरावली को व्यापक और पर्यावरण अनुकूल दृष्टिकोण से परिभाषित किया जाए। आदिवासी समुदायों के संवैधानिक और परंपरागत अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित हो। विकास, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक न्याय के बीच संतुलन स्थापित किया जाए। अत: अरावली की नई परिभाषा पर दूरगामी प्रभावों को ध्यान में रख कर की निर्णय लेने चाहिए ।
नगेन्द्र सिंह खंगारोत वाग्धारा, जयपुर