किसान ध्यान दें: सल्फर की कमी से बर्बाद तिलहनी फसल
(सभी तस्वीरें- हलधर)संतुलित उर्वरक के अन्तर्गत केवल नत्रजन, फास्फोरस और पोटाश के उपयोग पर बल दिया गया है। सल्फर के उपयोग पर विशेष ध्यान नहीं दिये जाने के कारण मृदा के नमूनों में 40 प्रतिशत गंधक (सल्फर) की कमी पाई गई। उपयोग में आ रहे गंधक रहित उर्वरक यूरिया, डीएपी, एनपीके और म्यूरेट ऑफ पोटाश के उपयोग से गंधक की कमी निरन्तर बढ़ रही है। गंधक की कमी मुख्यतः निम्न कारणों से भूमि के अन्दर हो जाती है, जिसकी तरफ किसानों का ध्यान नहीं जाता है।
सन्तुलित उर्वरक प्रयोग नहीं करना।
सल्फर रहित उर्वरक का प्रयोग।
जहां अकार्बनिक खाद प्रयोग में नहीं आती है, वहां पर भी सल्फर की कमी का होना।
गंधक कमी के लक्षण
पौधों की सामान्य बढ़ोतरी नहीं हो पाती तथा जड़ों का विकास कम होता है।
पौधों की ऊपरी पत्तियों (नई पत्तियों) का रंग हल्का पीला और आकार में छोटा हो जाता है, पत्तियों की धारियों का रंग तो हरा रहता है परन्तु बीच का भाग पीला हो जाता है। पत्तियां कप के आकार की हो जाती हैं। निचली सतह और तना लाल हो जाता है।
पत्तियों के पीलेपन की वजह से भोजन पूरा नहीं बन पाता। उत्पादन में कमी आने से तेल का प्रतिशत कम हो जाता है।
तना कठोर हो जाता है।
फसल की गुणवत्ता में कमी आ जाती है।
गंधक के कार्य
गंधक क्लोरोफिल का अवयव नहीं है। फिर भी, यह इसके निर्माण में सहायता करता है। पौधे के हरे भाग की वृद्धि करता है।
यह गंधक युक्त एमिनो अम्ल, सिस्टाइन, सिस्टीन तथा मिथियोनीन और प्रोटीन संश्लेषण में आवश्यक होता है।
सरसों के पौधों की विशिष्ट गंध निर्माण को यह प्रभावित करती है। तिलहनी फसलों के पोषण में गंधक का विशेष महत्त्व है। क्योंकि, बीज में तेल बनने की प्रक्रिया में इस तत्व की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।
सरसों के तेल में गंधक के यौगिक पाये जाते हैं। तिलहनी फसलों में तैलीय पदार्थ की मात्रा में वृद्धि करती है।
इसके प्रयोग से बीज बनने की क्रिया में तेजी आती है।