आलू की खेती में बड़ा मौका, प्रोसेसिंग शुरू हुई तो बढ़ेगी किसानों की कमाई
आलू की खेती में बड़ा मौका, प्रोसेसिंग शुरू हुई तो बढ़ेगी किसानों की कमाई
(सभी तस्वीरें- हलधर)जयपुर। हाड़ौती संभाग में आलू की उन्नत किस्मों का उत्पादन होने लगा है। इसके बावजूद प्रोसेसिंग की जमीन तैयार नहीं हो पा रही है। इससे संभाग में आलू की खेती का विस्तार अटका हुआ है। यदि प्रोसेसिंग की सुविधा किसानों को उपलब्ध हो जाएं तो सब्जियों का राजा कहलाने वाला आलू, खेतों का राजा बनते ज्यादा समय नहीं लगेगा। बता दें हाड़ौती संभाग में करीब 300-350 हैक्टेयर क्षेत्र में आलू की खेती हो रही है। कृषि विश्वविद्यालय कोटा संचालित अखिल भारतीय समन्वित आलू अनुसंधान परियोजना के तहत किसानों को रिसर्च आलू किस्मों के बारे में जानकारी और प्रशिक्षण तो मुहैया हो रहा है। लेकिन, प्रोसेसिंग सुविधा का अभाव खल रहा है। आलू शोध परियोजना से जुड़े डॉ. डीएएल यादव ने बताया कि संभाग में प्रोसेसिंग के काम आने वाली 5 किस्मों और टेबल परपज 5 किस्मों पर अनुसंधान किया जा चुका है। आलू किस्म कुफरी मोहन की मांग किसानों के बीच ज्यादा है। यदि किसानों को प्रोसेसिंग सुविधा मिल जाएं तो आलू की खेती किसानों के लिए और ज्यादा किफायती साबित हो सकती है।
वार्षिक समूह बैठक कल से
अखिल भारतीय समन्वित आलू अनुसंधान परियोजना की 44 वीं बैठक कृषि विश्वविद्यालय कोटा की मेजबानी में कल से आयोजित की जायेगी। इस बैठक में केन्द्रीय आलू अनुसंधान संस्थान, शिमला के अंतर्गत संचालित 17 एक्रिप केंद्रों, क्षेत्रीय केंद्र पटना, ग्वालियर और मोदीपुरम के 75 वैज्ञानिक भाग लेंगे।
नयी किस्मों का होगा विमोचन
बैठक में आलू फसल से संबंधित फसल सुधार, फसल उत्पादन और फसल संरक्षण के क्षेत्र में किए गए अनुसंधान कार्यों एवं प्राप्त परिणामों पर चर्चा की जाएगी। वैज्ञानिकों द्वारा विभिन्न अनुसंधान प्रयोगों के परिणाम प्रस्तुत किए जाएंगे और किसानों के लिए उपयोगी नई किस्मों के विमोचन और अनुशंसाओं पर विचार-विमर्श किया जाएगा। बैठक का प्रमुख उद्देश्य आलू उत्पादन की वर्तमान चुनौतियों के समाधान के साथ-साथ भविष्य की नवीन और उन्नत अनुसंधान रणनीतियों की रूपरेखा तैयार करना है।
रंगीन आलू किस्म भी
केंद्र पर आलू की कुफरी, माणिक, कुफरी नीलकंठ, कुफरी जामुनिया, कुफरी ललित, कुफरी सिंदूरी आदि रंगीन किस्मों पर अनुसंधान किया जा रहा है। इसमें कुछ किस्में किसानों को भी उपलब्ध करवाई गई थी, जिसका परिणाम भी अच्छा रहा। यह सभी किस्में 75 से 100 दिन में पककर तैयार हो जाती हैं।