वैज्ञानिक ओरोबैंकी, तना गलन प्रतिरोधी किस्मों का करे विकास
(सभी तस्वीरें- हलधर)भरतपुर में राई-सरसों वैज्ञानिकों की राष्ट्रीय बैठक का शुभारंभ
भरतपुर। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् के महानिदेशक डॉ. मांगी लाल जाट ने कहा कि सरसों की उत्पादकता बढ़ाकर ही देश को खाद्य तेलों के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है। उन्होंने ओरोबैंकी, तना गलन ओर ज्यादा तापमान प्रति प्रतिरोधी किस्मों के विकास पर विशेष जोर दिया। डॉ. जाट
भारतीय सरसों अनुसंधान संस्थान में दो दिवसीय राष्ट्रीय बैठक मे बोल रहे थे । उन्होंने प्री-ब्रीडिंग, फसल प्रणाली ओर प्रभावी तकनिकी हस्तांतरण के महत्व पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि बदलती जलवायु और बढ़ती उत्पादन आवश्यकता के बीच अधिक उत्पादकता हासिल करने के लिए इन तकनीकों को अनुसंधान कार्यक्रमों का हिस्सा बनाया जाना चाहिये । बता दे कि देश में राई-सरसों की उत्पादकता एवं गुणवत्ता में सुधार तथा उत्पादन क्षमता बढ़ाने के उद्देश्य से राई-सरसों की अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना की वार्षिक समूह बैठक का आयोजन हो रहा है । संस्थान के निदेशक डॉ. विजय वीर सिंह ने बताया कि बैठक में राई-सरसों की उन्नत किस्मों एवं संकरों के प्रदर्शन, अनुसंधान उपलब्धियों, उत्पादकता एवं गुणवत्ता सुधार, रोग एवं कीट प्रतिरोध, जलवायु अनुकूलन, आधुनिक जैव-प्रौद्योगिकी तथा आगामी अनुसंधान प्राथमिकताओं पर गहन वैज्ञानिक मंथन किया जाएगा।
जैव-प्रौद्योगिकी उपयोग पर जोर
बैठक में आइसीएआर के उप महानिदेशक (फसल विज्ञान) डॉ. देवेन्द्र कुमार यादव ने उन्नत किस्मों के विकास में जैव-प्रौद्योगिकी की नवीनतम तकनीकों के प्रभावी उपयोग पर जोर दिया। उन्होंने गुणवत्तायुक्त एवं बहुगुणी राई-सरसों की किस्मों के विकास की दिशा में हुई प्रगति का उल्लेख करते हुए बताया कि वर्तमान में ऐसी नवीन किस्में उपलब्ध हैं, जिनमें सफेद रतुआ प्रतिरोधकता के साथ-साथ कम इरुसिक अम्ल एवं कम ग्लूकोसिनोलेट जैसे महत्वपूर्ण गुणवत्ता गुण भी मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि आधुनिक जैव-प्रौद्योगिकी उपकरणों को पारंपरिक पादप प्रजनन के साथ समन्वित कर ऐसी उन्नत किस्मों के विकास को और गति दी जा सकती है, जो रोग प्रतिरोधी, उच्च उत्पादकता वाली तथा बेहतर गुणवत्ता से युक्त हों।
गुणवत्तापूर्ण बीज की समय पर उपलब्धता
सहायक महानिदेशक (तिलहन एवं दलहन) डॉ. एसके. झा ने राई-सरसों अनुसंधान में विभिन्न फसल सुधार कार्यक्रमों के समन्वय एवं प्राथमिकताओं पर प्रकाश डाला, जबकि सहायक महानिदेशक (बीज) डॉ. पीआर चौधरी ने गुणवत्तापूर्ण बीज की उपलब्धता तथा उन्नत किस्मों के प्रभावी बीज उत्पादन एवं प्रसार के महत्व पर विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने कहा कि उन्नत किस्मों की आनुवंशिक क्षमता का किसानों तक वास्तविक लाभ पहुंचाने के लिए गुणवत्तापूर्ण बीज की समय पर उपलब्धता अत्यंत आवश्यक है। पूर्व राष्ट्रीय प्रोफेसर डॉ. एस. एस. बांगा ने राई-सरसों में जीन-एडिटिंग जैसी आधुनिक तकनीकों के उपयोग से अधिक उत्पादकता एवं वांछित गुणों वाली किस्मों के विकास की संभावनाओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आधुनिक जीनोमिक एवं जीन-एडिटिंग तकनीकें भविष्य में फसल सुधार कार्यक्रमों को नई दिशा प्रदान कर सकती हैं।
BPM-11-NRCHB-101 को लेकर एमओयू
बैठक के दौरान अनुसंधान एवं प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के तहत भारतीय सरसों अनुसंधान संस्थान की स्पीड ब्रीडिंग सुविधा में अनुसंधान के लिए संस्थान तथा कामदगिरी क्रॉप साइंस के बीच करार किया गया। इसके साथ ही संस्थान की BPM-11 एवं NRCHB-101 किस्मों के प्रयोग के लाइसेंस के लिए क्रोवांटा महालक्ष्मी बायोसाइंस , गुजरात के साथ भी समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। इन समझौतों को अनुसंधान, नवाचार एवं निजी क्षेत्र के साथ प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।