आपकी गाड़ी का 'ग्रीन फ्यूल' देश को कर देगा प्यासा
(सभी तस्वीरें- हलधर)आजकल हम सब सुन रहे हैं कि पेट्रोल में इथेनॉल मिलाया जा रहा है ताकि प्रदूषण कम हो और तेल सस्ता मिले। इसे 'ग्रीन फ्यूल' कहा जा रहा है। लेकिन क्या आप जानते हैं, आपकी गाड़ी की टंकी में जो 1 लीटर इथेनॉल जा रहा है, वह कितना पानी पी चुका है?
उद्योगपति दिखा रहे चालाकी
नहीं ना...तो चलिए आपको बता दें कि एक लीटर इथेनॉल के पीछे 10,000 लीटर से ज्यादा पानी खर्च होने के आंकड़े सामने आए हैं और सच्चाई ये है कि उद्योगपति बड़ी चालाकी से केवल अपनी फैक्ट्री के अंदर के खर्च को गिनते हैं, लेकिन उस पानी को हर तरह से गायब कर देते हैं जो अनाज उगाने में लगा है, इसे पर्यावरण विज्ञान की भाषा में वॉटर फुटप्रिंट कहा जाता है।
वॉटर फुटप्रिंट की समीक्षा
जी हां, इथेनॉल को ग्रीन फ्यूल कहकर बेचने वाले उद्योगपति करोड़ों की सब्सिडी और मुनाफे के चक्कर में देश के जल संसाधनों पर डाका डाल रहे हैं। वो एग्रीकल्चर वेस्ट से इथेनॉल बनाने के बजाय सीधे अनाज का इस्तेमाल कर रहे हैं। अब समय आ गया है कि सरकार इस वॉटर फुटप्रिंट की समीक्षा करे। अगर हम आज नहीं जागे, तो आने वाली गाड़ियों में पेट्रोल तो डाल पाएगी पर गला तर करने के लिए पानी की एक-एक बूंद को तरसेगी।
सस्ता पेट्रोल अच्छी बात है, लेकिन इसकी कीमत भविष्य की प्यास नहीं होनी चाहिए। सरकार अनाज के बजाय खेती के कचरे से इथेनॉल बनाने पर जोर दे। साथ ही, कंपनियों के वॉटर फुटप्रिंट की जांच हो उन पर पर्यावरण जुर्माना लगे।