राजस्थान में प्राकृतिक खेती बनेगी किसानों की आय बढ़ाने रास्ता

नई दिल्ली 31-Jan-2026 01:01 PM

राजस्थान में प्राकृतिक खेती बनेगी किसानों की आय बढ़ाने रास्ता

(सभी तस्वीरें- हलधर)

राजस्थान, जो अपनी सांस्कृतिक धरोहर और रेगिस्तानी भूभाग के लिए जाना जाता है, अब कृषि क्षेत्र में एक नई क्रांति की ओर बढ़ रहा है। हरित क्रांति के कारण आज हम कृषि उपज में आत्मनिर्भर बन गए हैं। लेकिन, हरित क्रांति के क्षेत्रों में मृदा के क्षरण, जैव विविधता की हानि, प्राकृतिक संसाधनों की कमी आदि के रूप में नकारात्मक पर्यावरणीय प्रभाव भी बहुत अधिक दिखाई दे रहे हैं। सतत-संवहनीय कृषि पद्धतियों में से प्राकृतिक खेती जो हाल ही के समय में गति पकड़ रही है। यह 'स्थानीय पारिस्थितिकी के अनुसार की जाने वाली कृषि है और इसलिए इसे कृषि पारिस्थितिकी भी कहा जाता है। प्राकृतिक खेती इस राज्य के लिए सिर्फ एक कृषि पद्धति नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन, जल संकट और मिट्टी के क्षरण जैसी समस्याओं का समाधान भी है। यह पद्धति राज्य के किसानों को आत्मनिर्भर बनाने और टिकाऊ विकास की दिशा में अग्रसर करने का सशक्त माध्यम बन सकती है।

एक दार्शनिक दृष्टिकोण

प्राकृतिक खेती एक दार्शनिक दृष्टिकोण पर आधारित है जो प्रकृति के स्वयं के ज्ञान को प्रतिबिंबित करती है, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्राकृतिक खेती को पुनर्योजी कृषि का एक रूप माना जाता है, जो ग्रह को बचाने के लिए एक प्रमुख रणनीति है। भारत में परंपरागत कृषि विकास योजना के तहत प्राकृतिक खेती को भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति कार्यक्रम के रूप में बढ़ावा दिया जाता है। योजना का उद्देश्य बाहर से खरीदे जाने वाले आदानों के आयात को कम कर पारंपरिक स्वदेशी प्रथाओं को बढ़ावा देना है। प्राकृतिक खेती एक रसायन मुक्त कृषि पद्धति है जो स्थानीय रूप से उपलब्ध संसाधनों और पारंपरिक पद्धतियों का उपयोग करती है। यह कृषि पारिस्थितिकी पर आधारित है और फसलों, पेड़ों और पशुधन को एकीकृत करती है। प्राकृतिक खेती मृदा की गुणवत्ता और स्वास्थ्य में सुधार के लिये लाभकारी सूक्ष्मजीवों का भी उपयोग करती है।

राजस्थान में प्राकृतिक खेती का महत्व

  • जल संरक्षण: राजस्थान जैसे सूखा-प्रभावित राज्य में प्राकृतिक खेती जल की बचत करती है। यह तकनीक मिट्टी में नमी बनाए रखने में सहायक है, जिससे पानी की खपत में कमी आती है।

  • मिट्टी की उर्वरता: रसायनों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की उर्वरता में गिरावट आई है। प्राकृतिक खेती से जैविक पोषक तत्व मिट्टी में लौटते हैं, जिससे मिट्टी स्वस्थ होती है।

  • कम लागत और अधिक लाभ: प्राकृतिक खेती में स्थानीय संसाधनों का उपयोग किया जाता है, जिससे किसानों की लागत कम होती है। यह छोटे और सीमांत किसानों के लिए वरदान है।

  • स्वस्थ और जैविक उत्पाद: प्राकृतिक खेती से उत्पादित अनाज, फल और सब्जियां रसायनों से मुक्त होते हैं, जो उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य के लिए बेहतर है।

सरकार की भूमिका और प्रयास

मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा द्वारा वर्मी कम्पोस्ट इकाई निर्माण की शुरुआत की गई है। इससे मृदा की जैविक व भौतिक स्थिति में सुधार लाया जा रहा है। जिससे मृदा की उर्वरता और पर्यावरण संतुलन बना रहेगा। वर्मी कम्पोस्ट, जिसे वर्मीकल्चर के माध्यम से तैयार किया जाता है, मृदा की जैविक और भौतिक स्थिति को सुधारने में मदद करता है। इसमें कृमि के उपयोग द्वारा मृदा में जैविक पदार्थों को विघटित किया जाता है, जिससे मृदा की उर्वरता बढ़ती है। उसकी संरचना में सुधार होता है। यह प्राकृतिक उर्वरक मृदा को समृद्ध करता है और पर्यावरण को भी सहेजता है। क्योंकि, इसमें रासायनिक तत्वों की मात्रा कम होती है। इस पहल के माध्यम से न केवल मृदा की गुणवत्ता में सुधार होगा, बल्कि यह किसानों की लागत भी कम कर सकता है और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में सहायक होगा। राजस्थान सरकार प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न योजनाएं चला रही है।

किसान प्रशिक्षण कार्यक्रम

किसानों को प्राकृतिक खेती के तरीकों और लाभों के बारे में जागरूक किया जा रहा है। योजना के माध्यम से प्राकृतिक खेती करने के इच्छुक कृषकों को प्राकृतिक खेती से होने वाले लाभ, रासायनिक कीटनाशक और उर्वरक उपयोग से होने वाले नुकसान, कम लागत से खेती करने की विधि, स्थानीय स्तर पर जैव उत्पाद यथा जीवामृत, बीजामृत, नीमास्त्र, ब्रह्मास्त्र आदि तैयार कर उपयोग में लेने की विधि की प्रायोगिक जानकारी दी गई है। जिसका उपयोग कृषकों द्वारा खेती में लागत कम करने एवं उच्च गुणवत्ता के उत्पाद पैदा करने में किया जा रहा है।

सब्सिडी और वित्तीय सहायता

प्राकृतिक खेती को अपनाने वाले किसानों को आर्थिक सहायता दी जा रही है। जैविक बाजार का विकास: जैविक उत्पादों के लिए एक स्थायी बाजार बनाने की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं।


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