कम बारिश में भी मिलेगा भरपूर चारा, अपनाएं शुष्क क्षेत्र प्रबंधन तकनीक

नई दिल्ली 19-Sep-2026 05:04 PM

कम बारिश में भी मिलेगा भरपूर चारा, अपनाएं शुष्क क्षेत्र प्रबंधन तकनीक

(सभी तस्वीरें- हलधर)

असमय सूखा, कम बरसात के कारण शुष्क-अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में कृषि उत्पादन अनियमित होने के कारण मांग और आपूर्ति के बीच ज्यादा अन्तर है। अत्यधिक चराई के कारण चारागाह भूमि जीर्ण-शीर्ण हुई है और रेगिस्तान, बंजर भूमि का विस्तार हुआ है। चारा घास और दलहनी फसलों को साथ में उगाने से चारे को पौष्टिक, स्वादिष्ट और पाचक बनाया जा सकता है। मिश्रित चारागाह उगाकर भूमि की भौतिक अवस्था में सुधार, भूमि कटाव में रोक, खरपतवारों में कमी और मौसम प्रतिकूलता के प्रभाव को कम किया जा सकता है। दलहनी फसल से भूमि को 40 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर तक नत्रजन मिलती है और चारे में क्रूड प्रोटीन 3 गुणा तक बढ़ जाती है।

चरा घास और दलहनी फसल

सेवण घास

यह शुष्क क्षेत्रों की प्रचलित घास है। रेगिस्तान में इसका पौधा झाड़ीनुमा और तना पतला होता है जो कि चारा और हे बनाने में उपयोगी है। इससे 65 क्विंटल हरा चारा और 25 क्विंटल सूखा चारा प्रति हैक्टेयर प्राप्त होता है। इसके चारे में 6 प्रतिशत क्रूड प्रोटीन और 50 से 55 प्रतिशत पाचकता पाई जाती है। इसकी उन्नत किस्में: काजरी-317, काजरी-319 और काजरी-30-5 हैं।

अंजन घास

यह घास शुष्क क्षेत्र में जहाँ बरसात 100 से 750 मिमी. होती है, वहां उगाई जाती है। हल्की से मध्यम संरचना वाली बलुई मिट्टी इसके लिए अच्छी रहती है। हरे और सूखे चारे की पैदावार क्रमशः 150 से 180 और 40 से 60 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है। इसमें 6 से 9 प्रतिशत क्रूड प्रोटीन और 50 से 60 प्रतिशत पाचकता पाई जाती है। इसकी उन्नत किस्में बुंदेल अंजन-1, बुंदेल अंजन - 3, मारवाड़ अंजन, आईजीएफआरआई-एस-3133, सी-357 और सी-358 हैं।

धामण घास

यह घास अर्द्ध-शुष्क जलवायु वाले क्षेत्र में अच्छी होती है। इसके लिए हल्की बलुई मिट्टी उपयुक्त रहती है। इससे हरा और सूखा चारा क्रमशः 200 से 220 और 70 से 90 क्विंटल प्रति हैक्टेयर प्राप्त होता है। चारे में क्रूड प्रोटीन 6 से 9 प्रतिशत होता है। इसकी उन्नत किस्में काजरी - 76, काजरी - 392 हैं।

तितली मटर

यह दलहनी फसल अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में आसानी से स्थापित हो जाती है। इसको अंजन-धामण घास के साथ सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है। इससे सूखे चारे की 30 से 60 क्विंटल प्रति हैक्टेयर पैदावार मिलती है। इसके चारे में 18 प्रतिशत क्रूड प्रोटीन और 80 प्रतिशत पाचकता पाई जाती है। इसकी उन्नत किस्में काजरी-466, काजरी-752, काजरी-433, आईजीएफआरआई-23-1, आईजीएफआरआई-12-1, आईजीएफआरआई-40-1 हैं।

कैरीबियन स्टाइलो

यह दलहनी फसल उष्ण क्षेत्रों में कम उर्वरकता वाली, अच्छी तरह पानी निकासी वाली जमीन पर भी उगाई जा सकती है। इसका उपयोग चारा, हे और लीफमील के रूप में करते हैं। इससे सूखा चारा 30 क्विंटल प्रति हैक्टेयर तक प्राप्त होता है। इसके चारे में 17 से 24 प्रतिशत क्रूड प्रोटीन और अच्छी पाचकता पाई जाती है।

प्रबंधन:-

  • बुवाई का समय:- जुलाई-अगस्त

  • बीज दर:- 4-6 किग्रा प्रति हैक्टेयर, दलहनी फसल- 8-10 किग्रा प्रति हैक्टेयर

  • बीज की गहराई और दूरी:- 50 गुणा 30 सेमी दूरी। घास के बीज को 0.4 से 0.8 सेमी और दलहनी फसलों के बीज 0.8 से 1.2 सेमी गहराई पर बोना चाहिए।

  • खाद:- 40 से 60 किलोग्राम नत्रजन, 20-40 किग्रा फॉस्फोरस प्रति हैक्टेयर। नत्रजन 3 बराबर हिस्सों में देना चाहिए।

  • चराई-कटाई प्रबंधन:- कट और कैरी पद्धति में 50 प्रतिशत पुष्प अवस्था में 10 से 15 सेन्टीमीटर ऊंचाई पर चारे की कटाई अच्छी पैदावार देती है। 50 से 60 दिन के अन्तराल पर कटाई से चारा और क्रूड प्रोटीन की पैदावार अधिक होती है।

  • नियंत्रित आग जलन:- चारागाह को नम मौसम के दौरान लगभग 3 वर्ष के अन्तराल पर जलाना चाहिए।

  • अन्य क्रियाएं:- शुष्क क्षेत्रों में भूमि एवं जल के संरक्षण से संबंधित उपाय करना अति आवश्यक है जैसे कंटूर लाइन, मेड बनाना, पानी एकत्र करने के लिए चेक डैम बांध, एनीकट आदि बनाना। खुली जमीन पर सूखी घास/फसल अवशेष बिछाना चाहिए। कंटूर पर वनस्पति बढ़वार पानी के बहाव और मृदा कटाव रोकने में सहायक होती है।


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