आलू में प्रमुख रोग, लक्षण और प्रभावी प्रबंधन की पूरी जानकारी

नई दिल्ली 22-Dec-2025 02:19 PM

आलू में प्रमुख रोग, लक्षण और प्रभावी प्रबंधन की पूरी जानकारी

(सभी तस्वीरें- हलधर)

आलू सब्जियों की मुख्य फ सल है, आलू की फ सल कम समय में पैदा हो जाती है। इसमें स्टार्च, कार्बोहाइट्रेट, प्रोटीन, विटामिन सी और खनिज लवण काफ़ी मात्रा में होने के कारण कुपोषण के समाधान का स्त्रोत माना जाता है। आलू की फसल में रोग और उचित जल प्रबंधन की सटीक जानकारी नहीं होने की वजह से किसानों काफी नुकसान होता हैं। जिससे उत्पादन में कमी हो जाती है। अत: फफूंद, जीवाणु, वायरस जनित होने वाली बीमारियों का विवरण और नियंत्रण के उपाय अपनाकर किसान नुकसान से बचकर अधिक उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं।

काली रूसी : भण्डारण अथवा बुवाई से पूर्व आलू बीज को बोरिक एसिड रसायन का 3 प्रतिशत यानि 30 ग्राम दवा प्रति लीटर के हिसाब से घोल बनाकर 30 मिनट तक उपचारित करें। 

जीवाणु मृदुविगलन : रोग ग्रसित पौधों को उखाड़ कर जला दें। फ सल अवशेष को जला देना चाहिये। खेत में आवश्यकता से अधिक सिंचाई नहीं करें। जल निकासी का उचित प्रबन्ध करें। कंदों को भंडारण से पहले तीन प्रतिशत बोरिक एसिड के घोल में 30  मिनट तक डुबोकर उपचारित कर छाया में सुखायें।

पछेती अंगमारी : रोग के लक्षण दिखाई देते ही फ सल पर मैंकोजेब दवा का 0.2 प्रतिशत घोल बनाकर छिड़काव करें और रोग की उग्रता को देखते हुए यह छिड़काव 8-10 दिनों के अंतराल पर आवश्यकतानुसार दोहराये अथवा साइजोफैमिड 35 ईसी 4 प्रतिशत एससी 200 ग्राम को 700-800 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हैक्टयर की दर से घोल बनाकर छिड़काव करें। 

अगेती अंगमारी : रोग दिखाई देते ही 2-3 ग्राम मैंकोजेब अथवा कॉपर ऑक्सीक्लोराइड प्रति लीटर पानी का घोल बनाकर छिड़काव करें, आवश्यकता पडऩे पर 10-15 दिनों के अंतराल पर छिड़काव दोहरायें।

तनाऊतक क्षय रोग : नियंत्रण के लिए इमिडाक्लोप्रिड 17.8 प्रतिशत एसएल 6 मिली प्रति 10 लीटर पानी में बुवाई के 21 दिन बाद छिड़काव करें। रोग की उग्रता में दोबारा छिड़काव किया जा सकता है।


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