खीरे की जैविक खेती: कम लागत में बंपर पैदावार और दोगुना मुनाफा
(सभी तस्वीरें- हलधर)खीरे की फसल अल्पकालीन होती है। यह पाला सहन नहीं कर सकती है। ज्यादा सर्दी में पौधे का विकास अवरुद्ध हो जाता है। आर्द्रता और बादल की स्थिति में कीट-रोग प्रसारण को बल मिलता है। प्रकाश और तापमान की अधिकता में नर फूल की संख्या बढ़ जाती है। इससे उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। संरक्षित संरचना में खीरे का बेहतर उत्पादन किसान भाई प्राप्त कर सकते हैं। यदि किसान संरक्षित संरचना में जैविक विधि से खीरे की खेती करे तो दोगुना मुनाफा तय है।
खेत तैयारी- एक जुताई के बाद पाटा लगाकर।
उन्नत किस्म- जापानी लौंग ग्रीन, स्ट्रेटएट, पोइनसट, खीरा, पंजाब सेलेक्शन, पूना खीरा-7, पीसीयूएच-1, पूसा उदय, स्वर्ण पूर्णा, स्वर्ण शीतल। निजी कंपनियां भी खीरे का बीज किसानों को उपलब्ध करवा रही हैं। किसान बीज के गुणधर्म देखकर खरीद सकते हैं।
बीज बुवाई- जून-जुलाई
बीज दर- 2.5- 3.5 किग्रा प्रति हैक्टेयर।
पंक्ति से पंक्ति की दूरी- 150 सेमी
पौधे की दूरी- 60-70 सेमी
खाद और उर्वरक – खीरा की अच्छी पैदावार के लिये 60 किग्रा., नाइट्रोजन, 30 किग्रा. फॉस्फोरस और पोटाश 30 किग्रा. की आवश्यकता होती है। उपरोक्त तत्वों की पूर्ति के लिये 80-100 क्विंटल नाडेप कम्पोस्ट खाद अथवा 150-200 कुन्तल सड़ी गोबर की खाद के साथ 2 किग्रा. प्रति हैक्टेयर की दर से जैव उर्वरक को अन्तिम जुताई के समय खेत में मिला देना चाहिए। निराई-गुड़ाई और मिट्टी चढ़ाने (बुवाई के 30-35 दिन बाद) समय 2 किग्रा. जैव उर्वरक, और 2 कि.ग्रा. गुड़ को 150-200 किग्रा. अच्छी सड़ी कम्पोस्ट खाद के साथ छाया में सात से दस दिन तक सड़ाकर कर सिंचाई के समय खेत में बुरक दें। सूक्ष्म तत्वों की पूर्ति के लिए सिंचाई के पानी के साथ 3 बार जीवामृत का उपयोग करे।
सिंचाई- 2-3 दिन के अंतर पर।