बैंगन की जड़ों में गांठें दिखें तो सावधान, जानें बचाव के उपाय
(सभी तस्वीरें- हलधर)बैंगन अत्यन्त ही लोकप्रिय और पोषक तत्वों से युक्त फल है। सम्पूर्ण भारत में इसे व्यापारिक स्तर पर उगाया जाता है। लेकिन, कई सूत्रकृमि प्रजातियां बैंगन के पौधो को संक्रमित करती हैं, जैसे: जड़ गांठ अथवा मूल ग्रंथि सूत्रकृमि और लेजन सूत्रकृमि आदि। यह सूत्रकृमि प्रजातियां बैंगन में आर्थिक नुकसान पहुँचाती हैं। यह सूत्रकृमि व्यापक रूप से नर्सरी, उपरी भूमि और अच्छी जल निकास वाली भूमि में पाये जाते हैं। वैज्ञानिकों द्वारा किये गये शोध के आधार पर सूत्रकृमि का ज्यादा प्रकोप होने पर बैंगन में 50 से 60 प्रतिशत तक का नुकसान हो जाता है।
सूत्रकृमि गांठ की पहचान
पौधे की जड़ पर दो तरह की गांठें बनती हैं। एक सूत्रकृमि द्वारा बनाई हुई और दूसरी राइजोबियम जीवाणु द्वारा बनाई हुई। सूत्रकृमि विभिन्न प्रकार की फसलों अथवा पौधों में गांठें बनाते हैं। जबकि, जीवाणु राइजोबियम, दलहनी फसलों की जड़ों में गांठें बनाता है। सूत्रकृमि जनित गांठें फसल में पोषक तत्वों के वहन करने की क्षमता को कम करती हैं। जबकि, राइजोबियम की गांठ दलहनी फसलों में नाइट्रोजन स्थिरीकरण करके लाभ पहुँचाती है। सूत्रकृमि की गांठें जड़ के चारों ओर गोल आकृति में बनती हैं, जिन्हें अलग नहीं किया जा सकता है। जबकि, जीवाणु की गांठें जड़ की एक तरफ बनती हैं। जिन्हें रगड़कर आसानी से अलग कर सकते हैं।
सूत्रकृमि रोग के लक्षण
सूत्रकृमि के लक्षण खेत में गुच्छे में और कुछ क्षेत्र में पाये जाते हैं। बैंगन के सूत्रकृमि से ग्रसित पौधों की निचली पत्तियां पीली पड़ जाती हैं। पौधे मुरझा जाते हैं। पौधे बौने रह जाते हैं। पौधों में पुष्प और फल देरी से लगते हैं। फलों का आकार छोटा होता है और उनकी गुणवत्ता में कमी आ जाती है। पौधों की जड़ को उखाड़कर देखने पर यह दिखता है, कि पौधे की जड़ें सीधी न होकर आपस में गुच्छा बना लेती हैं और पौधे की जड़ों में गांठें दिखाई देती हैं।
रोग से हानियाँ
बैंगन के खेत में सूत्रकृमि प्राथमिक और द्वितीयक जड़ों को प्रभावित करके फसल को नुकसान पहुंचाते हैं। संक्रमित जड़ें भिन्न-भिन्न आकार की गांठें बनाते हैं। सूत्रकृमियों की संख्या अधिक होने पर पौधे द्वारा पानी और दूसरे पोषक तत्वों को प्राप्त करने में अवरोध उत्पन्न होता है। जिससे फसल की गुणवत्ता पर प्रभाव पड़ता है और उत्पादन में भी कमी आती है। क्योंकि, पौधे कमजोर, बौने, पीले हो जाते हैं। इससे ग्रसित पौधों में अन्य रोग जैसे उकठा, फफूंदी आदि भी शीघ्र लग जाते हैं। सामान्य अवस्था में इस रोग से 20 से 40 प्रतिशत तक नुकसान होता है। परंतु रोग की अधिकता होने पर 70 से 80 प्रतिशत तक की हानि हो सकती है।
रोग का प्रबंधन
फसल चक्र: सूत्रकृमियों की कई प्रजातियां जैसे: मेलाइडोगाइनी, ग्लोबोडेरा, हेटेरोडेरा आदि मृदा में लंबे समय तक सक्रिय नहीं रहते हैं। अतः फसल चक्र अपनाकर इनका रोकथाम की जा सकती है। जिन खेतों में जड़ गांठ सूत्रकृमि का प्रकोप हो रहा है, वहां ऐसी सब्जियों अथवा फसलों का चुनाव करें, जिनमें यह नहीं लगता जैसे: मक्का, गेहूं, ज्वार, बाजरा आदि।
स्वच्छ कृषि औजारों का प्रयोग: एक खेत से दूसरे खेत में कृषि औजारों के प्रयोग से पहले इन्हें अच्छी तरह से साफ कर लेना चाहिए। ताकि, सूत्रकृमि एक खेत से दूसरे खेत में कृषि औजारों के माध्यम से न जा पाए।
रोग रहित पौध का चुनाव: स्वस्थ, साफ और रोगरहित पौध का चुनाव करना चाहिए।
कार्बनिक खाद का प्रयोग: यह खादें सूत्रकृमियों के प्रति प्रतिरोध उत्पन्न करने वाले कुछ ऐसे कवक और बैक्टीरिया को बढ़ावा देती हैं, जिससे इनका प्रभाव कम हो जाता है। ढैंचा की भूमि की जुताई करके अथवा बीज बोने अथवा पौध लगाने के 20 से 25 दिन पहले डालना चाहिए। इनमें मुख्यतः नीम, सरसों, महुआ, अरण्डी आदि की खली 25 से 30 किलो प्रति हेक्टेयर की दर से डालें।
रक्षक फसलें: कुछ फसलें जैसे: गेंदा आदि की जड़ गांठ सूत्रकृमि की संख्या को कम कर देती हैं। ये फसलें रक्षक फसलें कहलाती हैं। इसके अलावा कुछ ऐसे फसलें, जिनकी जड़ों से ऐसे रसायनिक पदार्थ स्रावित होते हैं जो सूत्रकृमियों के लिये विष का काम करते हैं जैसे गेंदा आदि। इन्हें मुख्य फसलों के बीच में या मुख्य फसल के चारों तरफ 2 से 3 कतारों में लगाना चाहिए।
रोग ग्रस्त पौधों को नष्ट करके: यदि शुरुआत में सूत्रकृमि का प्रकोप बहुत कम है, तो रोगग्रस्त पौधों को उखाड़ देना चाहिए। तब प्रकोप कम हो जाता है।
ग्रीष्म कालीन गहरी जुताई: मई-जून के महीने में खेतों में 15 से 30 सेंटीमीटर गहरी जुताई करके छोड़ देनी चाहिए फिर जिससे सूत्रकृमियों के अंडे और डिंभक ऊपरी सतह पर आ जाते हैं जो सूर्य ताप द्वारा नष्ट हो जाते हैं।
खरपतवार नियंत्रण: खेतों में उगने वाले कई प्रकार के खरपतवारों पर सूत्रकृमि पनप कर पोषण प्राप्त करके अपना जीवन चक्र पूरा कर लेते हैं। आने वाली फसल पर आक्रमण करके हानि पहुंचाते हैं। अतः समय-समय पर खरपतवार का नियंत्रण करते रहें।
रोग प्रतिरोधी किस्मों का चयन: सूत्रकृमियों के प्रबंधन का यह सबसे सरल, सस्ता और प्रभावशाली उपाय है कि प्रतिरोधी किस्में उगानी चाहिए।
सूत्रकृमि का रासायनिक नियंत्रण
कार्बोफ्यूरान 2 किलोग्राम सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर भूमि में मिलायें अथवा बीज दर से उपचारित करें।
पौध को कार्बोसाल्फॉन 25 ईसी 500 पीपीएम से 1 घंटे तक उपचारित करने के बाद लगाये।
डाइक्लोरोप्रोपीन अथवा ऑक्सामिल 5 से 10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर अथवा विमफॉस 120 किग्रा प्रति हेक्टेयर की दर से भूमि में मिलाना चाहिये।
खेत में फ्लुओपायराम 400 ग्राम प्रति लीटर पानी का घोल बनाकर 200-1000 लीटर पानी प्रति हेक्टेयर छिड़काव करें।