फसलों में कीटों का प्रकोप रोकें, जानिए जैविक नियंत्रण के आसान तरीके

नई दिल्ली 09-Oct-2026 12:26 PM

फसलों में कीटों का प्रकोप रोकें, जानिए जैविक नियंत्रण के आसान तरीके

(सभी तस्वीरें- हलधर)

पौधों के हानिकारक कीड़े, बीमारियां और खरपतवार नाशीजीव की श्रेणी में आते हैं। इनका प्रकोप फसल को चौपट कर सकता है। अतः नाशीजीव की अवस्था पर प्रभावी प्राकृतिक तरीकों का उपयोग कर इनके प्रकोप का स्तर न्यूनतम रखना चाहिए।

खरपतवार प्रबंधन

खरपतवार फसल के छुपे दुश्मन हैं। यह फसल के हिस्से की खुराक-पानी और हवा खा जाते हैं। इन पर कीड़े-रोग भी पनपते हैं। इससे फसल की उपज बहुत कम हो जाती है। अतः ऐसे प्रयास करें कि खेत में खरपतवार नहीं उगे। इसके लिए साफ बीज की बुवाई करें। खेत में अच्छी तरह सड़ी हुई कम्पोस्ट अथवा गोबर की खाद डालें। खरपतवारों को बीज बनने से पहले ही उखाड़कर नष्ट कर दें। इससे अगले साल कम खरपतवार उगेंगे। खड़ी फसलों में खरपतवारों की मार शुरू के 20-30 दिन में ज्यादा पड़ती है। इसलिए खरपतवारों में उगते ही निराई-गुड़ाई करनी चाहिए।

कीट प्रबंधन

फसलों को हानि पहुँचाने वाले कीट मुख्य रूप से तीन प्रकार के होते हैं। पहले प्रकार के कीट पौधों का रस चूसकर अथवा वायरस का संक्रमण फैलाकर नुकसान पहुँचाते हैं। इनमें मोयला, चेपा, हरा तेला, थ्रिप्स, लाल मकड़ी, सुन्दर डंगा (पेन्टेड बग) आदि प्रमुख कीड़े हैं। इन हानिकारक कीड़ों के प्रकृति में अनेक दुश्मन मौजूद हैं, जैसे लेडीबर्ड बीटल, क्राईसोपला और मकड़ी। (चित्र विवरण: क्राईसोपला अब प्रयोगशाला में तैयार किए जाने लगे हैं।)

ट्राईकोग्राम

दूसरे प्रकार के कीड़ों में सुण्डियों (लट) प्रमुख हैं, जो फसलों को काटकर और कुतरकर हानि पहुँचाती हैं। प्रकृति में इन कीड़ों के दुश्मन भी मौजूद हैं, ट्राईकोग्राम के द्वारा लटों को अण्डों से निकलने से पहले नष्ट किया जा सकता है। अतः फसल के अनुसार इनका प्रयोग किया जा सकता है।

प्रकाश पास

तीसरे प्रकार के कीड़े भूमि में रहते हैं। ये फसल की जड़ों को काटकर खाते हैं। इनमें दीमक और सफेद लट प्रमुख हैं। कच्चा देशी खाद और फसल के बिना सड़े अवशेष खेत में डालने से दीमक का प्रकोप बढ़ता है। अतः अच्छी तरह सड़ी-गली कम्पोस्ट खेत में बुवाई से एक माह पहले मिला देवें। दीमक नमी से दूर भागती है, अतः खेत में नमी की भी कमी नहीं रहने देवें। दीमक के बिल को खोदकर रानी को नष्ट कर देवें। चौमासे की पहली वर्षा के समय सफेद लट के प्रौढ़ (भृंग) जमीन से निकलते हैं। रात में कीड़े नीम, बेर, खेजड़ी को खाते हैं। साथ ही प्रकाश पर भी आते हैं। पेड़ों को खाते भृंग को दूसरे दिन इकट्ठा कर मार दें। इसके अलावा प्रकाश पाश के द्वारा भी भृंगों को पकड़ कर मार दें। लट से बचने के लिए एक हैक्टेयर भूमि में 10-12 टन नीम की खली मिलाएँ। इससे सभी प्रकार के कीड़ों से फसल बची रहती है। ऐसी स्थिति में सुण्डियों के नियंत्रण के लिए बी.टी., एन.पी.वी. आदि का उपयोग प्रभावी होता है। नीम की पत्तियों का रस, नीम का तेल, नीम की खली और नीम के तेल में उपस्थित अजाडिरेक्टिन बहुत प्रभावी कीटनाशक का काम करता है। इनके अतिरिक्त फेरोमोन ट्रेप, प्रकाशपाश द्वारा भी प्रौढ़ कीटों को पकड़कर नष्ट किया जा सकता है।

बीमारियों का प्रबंधन

  • जैविक तरीकों से बीमारियों की रोकथाम कीड़ों के बजाय कठिन होती है। अतः रोगों से बचने के लिए शुरू से सावधान रहना आवश्यक है।

  • भूमि के हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करने के लिए गर्मियों में गहरी जुताई करनी चाहिए। इससे जमीन में छुपे जीवाणु नष्ट हो सकते हैं।

  • किसानों को फसल चक्र अपनाना चाहिये, जिससे मृदा और बीज जनित बीमारियों से बचाया जा सके।

  • रोग प्रभावित पौधों को खेतों से उखाड़ कर जला देना चाहिये।

  • फसलों के बीजों को जैविक उत्पादों (ट्राईकोडर्मा, नीम उत्पाद) से उपचारित करके बुवाई करनी चाहिए।


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