सरसों में सफेद गलन रोग बढ़ा, अभी छिड़काव जरूरी

नई दिल्ली 08-Jan-2026 03:30 PM

सरसों में सफेद गलन रोग बढ़ा, अभी छिड़काव जरूरी

(सभी तस्वीरें- हलधर)

राई-सरसों की फसल में लगने वाला तनागलन रोग पूर्व में प्रमुख रोग की श्रेणी में नहीं था। परन्तु विगत कुछ सालों से इस रोग का फैलाव असम, उत्तरप्रदेश, बिहार, हरियाणा और राजस्थान में हो रहा है। इस बीमारी को श्वेत अथवा कॉलर गलन भी कहा जाता है। यह रोग स्क्लेटोनिया स्क्लेरोसियोरम नामक फफूंद के प्रकोप से उत्पन्न होता है। इस रोग के प्रकट होने पर तने के निचले भाग में मटमैले अथवा भूरे रंग के फफोले दिखाई देते हैं। प्रायः यह फफोले रूई जैसे सफेद जाल से ढके होते हैं। पत्तियों पर इसके लक्षण कम ही दिखाई देते हैं। इसी कारण, जब तक कि पूरा का पूरा पौधा अंदर से गल न जाए, रोग ग्रस्त पौधे आसानी से पहचाने नहीं जा सकते।

यह है लक्षण

ये फफोले तने और पत्तियों को इस तरह ढक देते हैं कि पौधा मुरझाकर लटक जाता है और अंत में सूख जाता है। जब रोग की शुरुआत पत्ती से होती है, तब पत्ती मुरझाकर नीचे की ओर लटक जाती है, फिर धीरे-धीरे रोग तने पर भी फैल जाता है। इस रोग के प्रभाव से पौधा बौना हो जाता है और समय से पहले ही पक जाता है। फलियाँ बनते समय तनों पर लम्बे पनिहल धब्बे बनते हैं। इन धब्बों के ऊपर कवक जाल रूई की तरह फैला रहता है। तना अंदर से सड़कर खोखला हो जाता है और आगे चलकर तना फट जाता है। ग्रसित तने की सतह पर अथवा मज्जा में भूरी सफेद अथवा काली-काली गोल आकृति की संरचनायें (स्क्लेरोशिया) पाई जाती हैं।

रोग के स्क्लेरोशिया काले उड़द के दानों की तरह तने के भीतरी भाग में पनपते हैं, जिससे कि बाहर से देखने पर उसका आभास भी नहीं हो पाता, कई बार ये स्क्लेरोशिया तने की ऊपरी सतह पर भी दिखाई देते हैं। अत्यधिक आर्द्रता (90-95 प्रतिशत सापेक्षिक आर्द्रता), औसत तापमान (18-25 डिग्री सेन्टीग्रेड) और हल्की हवा इस रोग को फैलाने में सहायक है।

प्रबंधन

स्वस्थ, स्वच्छ और रोग रहित बीज का उपयोग करें। रोग ग्रसित फसल अवशेषों को जला कर अथवा गाड़ कर नष्ट कर दें। गर्मी में गहरी जुताई करें। गेहूं, जौ, धान और मक्का इत्यादि उन फसलों की बुवाई करें जो रोगग्राही न हो और समुचित फसल चक्र अपनायें। बीजोपचार 2 ग्राम कार्बेन्डाजिम प्रति किलो बीज से करें। कार्बेन्डाजिम 0.2 प्रतिशत (2 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर) फफूँदनाशी का छिड़काव फूल के आने के समय (बुवाई के 60-65वें दिन पर) करने से रोग का बचाव किया जा सकता है। तना गलन रोग में सिंचाई का महत्वपूर्ण स्थान है, अतः 20 दिसम्बर से 15 जनवरी के मध्य किसी भी अवस्था में सिंचाई न करें। दिसम्बर अन्त में अथवा जनवरी प्रथम सप्ताह में वर्षा होने पर कार्बेन्डाजिम का छिड़काव करें। ध्यान रखें की छिड़काव रोग पनपने से पहले ही किया जाए और पौधों के सभी भागों पर हो जाए। लहसुन का 2 प्रतिशत सत् का छिड़काव, बुवाई के 50 दिन बाद जब फसल में 25-30 प्रतिशत फूल आ जायें, करने पर भी रोग की रोकथाम की जा सकती है। आवश्यकतानुसार दूसरा छिड़काव इसके 20 दिन बाद करें। लहसुन का 2 प्रतिशत सत् तैयार करने के लिए 20 ग्राम लहसुन को बारीक पीसकर कपड़े से छानें और एक लीटर पानी में मिलाकर घोल तैयार करें। ध्यान रखें की छिड़काव रोग पनपने से पहले ही किया जाए और पौधों के सभी भागों पर हो जाए।


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