सिर्फ पौधों से बदली तस्वीर, डूंगरपुर में 55 हजार किसानों की आय बढ़ी
(सभी तस्वीरें- हलधर)जयपुर। ...बर्फ जमने तक हौंसला बनाएं रखों। यह बात सटीक हो रही है कृषि विज्ञान केन्द्र, डूंगरपुर के प्रयासों पर। एक दिन में नहीं, एक दिन होगा की तर्ज पर जनजातिय किसानों के हालात बदलने का काम किया है। इससे ना केवल जिले में फल-सब्जी के क्षेत्रफल में बढौत्तरी दर्ज हुई है। बल्कि, किसान आय और विश्वविद्यालय के राजस्व स्तर में भी सुधार देखने को मिला है। गौरतलब है कि अब तक 55 हजार से ज्यादा किसान फल-सब्जी उत्पादन से जुडक़र अपनी आजीविका में सुधार कर चुके है। यह बदलाव एक दिन की कहानी नहीं है। यह मेहनत है डेढ़ दशक की। गौरतलब है कि वर्ष 2011 में केवीके में नर्सरी की शुरूआत हुई थी। जिसके परिणाम अब सबके सामने है। यह स्थिति तब है जब कृषि विज्ञान केन्द्र में पर्याप्त स्टॉफ नहीं है। इससे कहा जा सकता है कि कृषि में बदलाव के लिए लाखों करोड़ो रूपए लागत की बड़ी योजनाएं बनाने की जरूरत नहीं है। किसानों को गुणवत्तापूर्ण और अधिक उत्पादकता देने वाली पौध रोपण सामग्री उपलब्ध कराकर भी कृषि क्षेत्र में नई क्रांति लाई जा सकती है।
ऐसे समझे बदलाव
डूंगरपुर जिले सहित आस-पास के किसानों को गुणवत्तापूर्ण पौधरोपण सामग्री उपलब्ध कराने के लिए कृषि विज्ञान केन्द्र ने वर्ष 2011 में नर्सरी स्थापित की। उस समय डूंगरपुर जिले में 250 हैक्टयर क्षेत्र में बागवानी और 58 हैक्टयर क्षेत्र में सब्जी फसलों का उत्पादन होता था। लेकिन, वर्तमान में फल-सब्जी का बुवाई क्षेत्र काफी बढ़ चुका है। साथ ही, उत्पादन का आंकड़ा भी। इससे किसानों की आय के साथ-साथ सामजिक स्तर में भी बदलाव देखने को मिला है। केन्द्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. सीएम बलाई ने बताया कि वर्तमान में 900 हैक्टयर क्षेत्र में बागवानी फसलो का उत्पादन हो रहा है। वहीं, सब्जी फसलों का बुवाई क्षेत्र बढक़र 900 हैक्टयर तक पहुंच चुका है।
एनएचबी से फाइव स्टार रेटिंग
वर्ष 2010-2011 में किसानों को बागवानी और सब्जी उत्पादन से जोडऩे के लिए राष्ट्रीय बागवानी मिशन के तहत 0.4 में एक मॉडल नर्सरी की स्थापना की गई। वर्ष 2019 में नर्सरी का नवीनीकरण किया गया। परिणाम रहा कि राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड के द्वारा नर्सरी को फाइव स्टार रेटिंग प्राप्त हो चुकी है।
तैयार होते है लाखों पौधें
उन्होंने बताया कि नर्सरी में पपीता, आम, कटहल, नींबू, सहजन, जामुन, अमरूद, आंवला, सीताफल, अनार, चीकू, बेर के साथ-साथ पुष्पीय पौधों में रजनीगंधा, गुलाब, अशोक के पौधें तैयार किए जा रहे है। वहीं, इमारती लकड़ी के काम आने वाले पौधों में सेमल, सागवान, महुआ शामिल है। जबकि, सब्जी पौध में मिर्च, टमाटर, बैंगन और गोभीवर्गीय फसल की कई किस्मों के पौधें तैयार किए जा रहे है।
55 हजार से ज्यादा किसान
वर्ष 2015-16 से लेकर अब तक 55 हजार 810 किसान कृषि विज्ञान केन्द्र से फल-सब्जी पौध की खरीद कर चुके है। इससे केवीके को 1 करोड़ 29 लाख रूपए से अधिका का राजस्व मिला है। दशक के दौरान फल के 2.69 लाख और सब्जी फसलों के 18.84 लाख पौध तैयार करके किसानों को उपलब्ध कराई गई है।
कृषि में बदलाव एक दिन की कहानी नहीं है। इसके लिए ठोस रणनीति और किसानों के सुझाव पर फोकस करना रहता है। केवीके डूंगरपुर की उपलब्धि विश्वविद्यालय के दूसरे सभी केवीके के लिए एक मिसाल है।
डॉ. प्रताप सिंह, कुलगुरू, एमपीयूएटी, उदयपुर