वैकल्पिक उर्वरक, मशीनीकरण और जैव फसलों पर आईसीएआर का फोकस

नई दिल्ली 16-Oct-2026 12:29 PM

वैकल्पिक उर्वरक, मशीनीकरण और जैव फसलों पर आईसीएआर का फोकस

(सभी तस्वीरें- हलधर)

नई दिल्ली। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) कृषि उत्पादन बढ़ाने के साथ किसानों की आय, पोषण सुरक्षा और टिकाऊ खेती को मजबूत करने के लिए नई तकनीकों पर तेजी से काम कर रही है। इसके तहत वैकल्पिक उर्वरक उत्पादन की संभावनाओं से लेकर खारे क्षेत्रों में झींगा पालन, कृषि मशीनीकरण, जैव-संवर्धित फसलों और खाद्य गुणवत्ता तक विभिन्न क्षेत्रों में अनुसंधान को आगे बढ़ाया जा रहा है।

ईएसटीआईसी 2026 से जुड़े पूर्वालोकन समारोह एवं मीडिया संवाद में बताया गया कि आईसीएआर, नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय और अन्य हितधारकों के सहयोग से छह राज्यों में करीब 10 हजार एकड़ क्षेत्र में प्रदर्शन किए गए हैं। उर्वरक उत्पादन के वैकल्पिक उपायों की संभावनाओं पर भी अनुसंधान किया जा रहा है।

आईसीएआर के अनुसंधान में मत्स्य पालन एवं जलीय कृषि, पशुधन स्वास्थ्य, एकीकृत कीट प्रबंधन और कृषि मशीनीकरण को भी प्रमुखता दी गई है। खारे क्षेत्रों में झींगा पालन के जरिए कम उपयोग वाली भूमि और जल संसाधनों को उत्पादक बनाने पर काम किया जा रहा है। वहीं कपास कटाई मशीनरी सहित कृषि इंजीनियरिंग की नई तकनीकों के माध्यम से खेती में श्रम की समस्या कम करने और कार्यक्षमता बढ़ाने का प्रयास है।

कृषि को स्वास्थ्य से जोड़ने के लिए ‘सेहत’ पहल

आईसीएआर और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने संयुक्त रूप से ‘सेहत’ पहल विकसित की है। इसके तहत जैव-संवर्धित फसलों और एकीकृत कृषि प्रणालियों के जरिए कृषि, खाद्य एवं मानव स्वास्थ्य को आपस में जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है। आईसीएआर-राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (एनडीआरआई) ने दूध में मिलावट की मौके पर ही तेजी से पहचान करने के लिए ऑन-साइट दूध मिलावट पहचान किट भी विकसित की है।

ईएसटीआईसी 2026 में ‘कृषि प्रौद्योगिकी, खाद्य प्रणाली और पोषण’ विषय पर आयोजित तकनीकी सत्र में कृषि नवाचार, खाद्य प्रणाली और पोषण सुरक्षा पर विशेषज्ञ मंथन करेंगे। मोरक्को की कृषि वैज्ञानिक एवं अंतरराष्ट्रीय कृषि अनुसंधान पर सलाहकार समूह की कार्यकारी प्रबंध निदेशक डॉ. इस्माहाने एलाउआफ़ी मुख्य वक्ता होंगी।

कार्यक्रम का उद्देश्य खाद्य एवं पोषण सुरक्षा, किसान समृद्धि और टिकाऊ कृषि विकास में विज्ञान एवं नई प्रौद्योगिकी की भूमिका को सामने लाना है। इसमें लवण प्रभावित मिट्टी के सुधार, कम गुणवत्ता वाले पानी के बेहतर प्रबंधन और लवण-सहिष्णु फसल किस्मों के विकास पर किए जा रहे अनुसंधान को भी प्रमुखता से प्रस्तुत किया गया।


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