कपास छोड़ किसान क्यों अपना रहे हैं सूरजमुखी? जानिए पूरा सच

नई दिल्ली 27-Jan-2026 04:31 PM

कपास छोड़ किसान क्यों अपना रहे हैं सूरजमुखी? जानिए पूरा सच

(सभी तस्वीरें- हलधर)

जयपुर। राजस्थान में फसल विविधीकरण और किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में सूरजमुखी की उन्नत खेती एक सफल प्रयोग के रूप में सामने आई है। टांटिया विश्वविद्यालय, श्रीगंगानगर के कृषि वैज्ञानिक डॉ. जितेंद्र सिंह राणावत द्वारा किए गए शोध में यह प्रमाणित हुआ है कि सूरजमुखी कम पानी में, क्षारीय भूमि में भी बेहतर उत्पादन देने वाली फसल है। विशेष रूप से श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ जैसे कपास पट्टी वाले क्षेत्रों में यह फसल कपास का प्रभावी विकल्प बन सकती है, जहाँ किसान गुलाबी सुंडी के कारण भारी नुकसान झेल रहे हैं।

100 दिन में तैयार

गौरतलब है कि सूरजमुखी की फसल 100 से 110 दिनों में पककर तैयार हो जाती है और रबी, खरीफ और जायद तीनों मौसमों में ली जा सकती है। शोध के दौरान प्रति बीघा 3.5 से 5 क्विंटल तक उपज दर्ज की गई है। उन्होने बताया कि सूरजमुखी की खेती में लागत काफी कम आती है। जहाँ कपास की खेती पर प्रति हैक्टयर 15 से 18 हजार रुपये तक खर्च आता है, वहीं सूरजमुखी करीब 5 हजार  लागत में तैयार हो जाती है। बारिश के मौसम में इसे अलग से सिंचाई की भी आवश्यकता नहीं होती।

जरूरत व्यवसायिक खेती की 

विश्वविद्यालय के वाइस चेयरपर्सन डॉ. मोहित टांटिया ने सूरजमुखी उत्पादन को एक बेहतरीन परियोजना बताते हुए कहा कि शैक्षणिक गुणवत्ता को व्यावसायिक खेती से जोडऩा समय की आवश्यकता है। इससे छात्रों और शोधार्थियों को प्रायोगिक ज्ञान मिलेगा और किसानों को वैज्ञानिक मार्गदर्शन के साथ नई तकनीक अपनाने का अवसर मिलेगा।

यह होगा लाभ

कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि सरकार सूरजमुखी की खेती को कपास पट्टी एवं अन्य उपयुक्त क्षेत्रों में प्रोत्साहित करती है, तो इससे न केवल किसानों की आय बढ़ेगी।  बल्कि, मृदा संरक्षण, जल उपयोग दक्षता और खाद्य तेल उत्पादन में भी राज्य को बड़ी सफलता मिल सकती है। 

सवाईमाधोपुर में शोध जारी  

उधर, अमरूद पट्टी सवाईमाधोपुर में भी सूरजमुखी पर वैज्ञानिक शोध हो रहा है। फसल विविधिकरण को बढावा देकर किसानों की आय बढाने के उद्धेश्य से कृषि विज्ञान केन्द्र पर सूरजमुखी का एकल और इंटरक्रॉपिंग आधारित प्रदर्शन लगाए गए है। शोधार्थी नुपुर शर्मा ने बताया कि रबी में यहां के अधिकांश किसान सरसों और चना फसल तक ही सीमित रहते है। किसानों को रबी में नई फसल उपलब्ध कराने के लिए उद्धेश्य से यह शोध कार्य किया जा रहा है। रबी में सरसों के साथ चना, गेहूं के साथ सूरजमुखी, कुसुम के साथ मसूर और चने के साथ सूरजमुखी की फसल की अंतसस्य प्रदर्शन लगाए है। जबकि, खरीफ में  बाजरा के साथ उड़द, मूंग, ग्वार, अरहर आदि फसल के उत्पादन स्तर को परखा जा रहा है। इस शोध का मुख्य उद्देश्य एक ऐसी फसल प्रणाली विकसित कर किसानों तक पहुंचना है, जिससे फसल उत्पादकता, मृदा स्वास्थ्य और आय में बढौत्तरी संभव हो सके। 


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