कृषि विश्वविद्यालयों में एक समान पाठ्यक्रम पर उठे सवाल, जानिए पूरी वजह 

नई दिल्ली 22-Sep-2026 04:06 PM

कृषि विश्वविद्यालयों में एक समान पाठ्यक्रम पर उठे सवाल, जानिए पूरी वजह 

(सभी तस्वीरें- हलधर)

जयपुर। प्रदेश के पांचो कृषि विश्वविद्यालय में कुलगुरू जरूर बदले है। लेकि न, जॉनी-जॉनी यस पापा कहने का रिवाज नहीं। इसके चलते कृषि क्षेत्र में प्रदेश अब तक कृषि क्षेत्र में मॉडल स्टेट नहीं बन पाया है। बता दें कि सरकार अथवा राज्यपाल बदलने के साथ ही एक नया शगूफा छोड़ा जाता है और इसके परिणाम ढ़ाक के तीन पात रहता है। वर्तमान में भी कुलगुरू राज्यपाल के खुले आह्वान पर कुछ ऐसी ही कवायद में जुटे हुए है। पिछले दिनों जोबनेर कृषि विश्वविद्यालय में आयोजित एक कार्यक्रम में राज्यपाल ने सभी कृषि विश्वविद्यालयों में एक समान पाठ्यक्रम पर जोर दिया। वहीं, इससे पूर्व एक मीडिया रिपोर्ट में सभी विश्वविद्यालयों के मध्य कार्य विभाजन की बात भी सामने आई। ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब परीक्षा से लेकर रिसर्च, प्रसार शिक्षा, शिक्षा और खेलकूद एक समान रूप से आयोजित होने लग जाएंगे तो क्षेत्रीय जलवायु के हिसाब खोले गए विश्वविद्यालयों का वजूद क्या रहेगा? इस कवायद को लेकर कृषि शिक्षाविदों का कहना है कि विश्वविद्यालय एक्ट को समान करने तक बात समझ आती है। लेकिन, एक सामन पाठ्यक्रम और रिसर्च गतिविधियों से विश्वविद्यालय अपनी पहचान खो देंगे। इससे तो अच्छा है कि सरकार केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय पर फोकस करें और मौजूदा विश्वविद्यालयों को कृषि और औद्योगिकी क्षेत्र की आवश्यकता के आधार स्पेशलाइजेशन कर दिया जाएं। इससे कुशल मानव संसाधन भी तैयार होगा। साथ ही, कृषि क्षेत्र में बेरोजगार की समस्या भी दूर होगी। इससे रिसर्च परिणाम भी समय पर सामने आयेंगे और रिसर्च का लैब से लैंड़ तक पहुंचाने का काम भी आसान हो सकेगा। गौरतलब है कि बता चाहे थार में अनार की बात हो या फिर, अंजीर, ड्रेगन फ्रू ट, लीची या अन्य फसलों की। कृषि क्षेत्र में जो भी विविधकरण हुआ है, वह सिर्फ किसानों के बलबूते पर हुआ है। सरकार और कृषि विश्वविद्यालय तो इतने वर्षो में भी उच्च मूल्य वर्ग वाली फसलों के लिए पीओपी तक तैयार नहीं कर पाएं है। रिसर्च का काम अब भी परम्परागत फसलों तक ही सिमित है। ऐसे में एक समान पाठ्यक्रम और अन्य गतिविधियों की बात कृषि शिक्षा के लिहाज के कतई उचित नहीं कही जा सकती है। गौरतलब है कि विश्वविद्यालय के पेशनर्स लंबे समय से पेंशन भुगतान की मांग सरकार से कर रहे है। अधिकांश विश्वविद्यालयों में सैकड़ो पद रिक्त चल रहे है।

एक समान रिक्रूटमेंट क्यों नहीं

जब सभी विश्वविद्यालय में कॉमन पाठ्यक्रम की कवायद राजभवन के निर्देश पर की जा रही है तो रिक्रूटमेंट और ट्रांसफर पॉलिसी जैसे मुद्दे को अलग क्यों छोड़ा जा रहा है? इस क्षेत्र में भी समानता लाई जा सकती है। एक केन्द्रीयकृत व्यवस्था के तहत सभी विश्वविद्यालयों में रिक्तियों के आधार पर एक ही नोटिफिकेशन के जरिए कुलगुरू चयन से लेकर शैक्षणिक और अशैक्षणिक वर्ग के पदों पर भर्ती परीक्षा, साक्षात्कार और नियुक्ति प्रदान की जा सकती है। इससे भर्ती के समय सरकार और कुलगुरू पर लगने वाले भ्रष्टाचार और जातिवाद को लेकर भी किसी को अंगुली उठाने का मौका नहीं मिलेगा।

ऐसे समझे कहानी

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक जोधपुर कृषि विश्वविद्यालय को परीक्षा कैलेंडऱ तैयार करने, कोटा को रिसर्च, उदयपुर को प्रसार शिक्षा, जोबनेर को कृषि शिक्षा और बीकानेर को खेलकूद-सांस्कृतिक कार्यक्रमों का कैलेंडऱ तैयार करने के निर्देश दिए गए है।

भौगोलिक बनावट अलग-अलग

गौरतलब है कि राजस्थान की भौगोलिक बनावट और कृषि-जलवायु विविधता कृषि विश्वविद्यालयों के स्वरूप को एक विशेष दिशा प्रदान करती है। राज्य का 61 प्रतिशत क्षेत्र शुष्क, 16 प्रतिशत क्षेत्र अर्ध-शुष्क, 15 प्रतिशत आर्द्र और शेष 8 प्रतिशत उप-आर्द्र क्षेत्र के अंतर्गत आता है। इस विशिष्ट क्षेत्रीय विविधता के अनुरूप ही बीकानेर और जोधपुर में स्थापित कृषि विश्वविद्यालय शुष्क क्षेत्रों की आवश्यकताओं को पूरा कर रहे हैं। जोबनेर अर्ध-शुष्क क्षेत्र के लिए, उदयपुर उप-आर्द्र क्षेत्र के लिए और कोटा आर्द्र क्षेत्रों के लिए कार्य कर रहे हैं।

आईसीएआर नियमों से परे

राजभवन के निर्देश पर हो रही कवायद में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली के मौजूदा नियम भी मखौल बनते नजर आयेंगे। कृषि शिक्षाविदों ने बताया कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के विजन के अनुसार, प्रत्येक विश्वविद्यालय को अपने क्षेत्र की भौगोलिक और कृष संबंधी विशेष आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए विशिष्ट पाठ्यक्रम डिजाइन करने चाहिए और मूल्यांकन प्रणाली को भी उसी के अनुरूप संरेखित करना चाहिए। यहाँ तक कि डीन समिति , जो पाठ्यक्रम रूपरेखा तैयार करने के लिए उत्तरदायी है, यह अनुमति देती है कि कुल पाठ्यक्रमों का 30 प्रतिशत हिस्सा क्षेत्र-विशिष्ट  होना चाहिए। क्योंकि, फसलों का वितरण, विकास और प्रबंधन भी पूरी तरह से भौगोलिक परिस्थितियों पर ही निर्भर करता है।

क्षेत्रीय और फसल आधारित दृष्टिकोण

उन्होने बताया कि पाठ्यक्रम एक जैसा नहीं होना चाहिए। राजस्थान जैसे मरुस्थलीय राज्य में बाजरा और सूखा-रोधी फसलों पर ध्यान होना चाहिए। जबकि, उपजाऊ मैदानी इलाकों में अन्य फ़सलों पर। यानी स्थानीय मौसम और वहाँ उगाई जाने वाली प्रमुख फसलों के आधार पर पढ़ाई होनी चाहिए। कृषि विज्ञान के मूल सिद्धांत पूरे देश में एक जैसे होने चाहिए, इसलिए 70 प्रतिशत पाठ्यक्रम कॉमन रखा जाए। बाकी का 30 प्रतिशत पाठ्यक्रम उस राज्य या क्षेत्र की विशिष्ट आवश्यकताओं (जैसे पहाड़ी कृषि, तटीय कृषि आदि) के अनुसार तय हो।

बीए और बीकॉम की डिग्री नहीं

बीएससी एग्रीकल्चर बीए और बीकॉम की तरह कोई साधारण डिग्री नहीं, बल्कि एक तकनीकी डिग्री है। यह अधिक व्यक्तिगत और अनुकूली शिक्षण पर आधारित है, जिसके लिए ज्ञान, कौशल, क्षमता और अनुभव के बेहतरीन तालमेल की आवश्यकता होती है।

इस पाठ्यक्रम की संरचना को इस प्रकार तैयार किया जाना चाहिए कि इसका 70 प्रतिशत पाठ्यक्रम बुनियादी और मौलिक सिद्धांतों पर आधारित हो। शेष 30 प्रतिशत पाठ्यक्रम क्षेत्र-विशेष आवश्यकताओं के अनुसार हो, जिसकी अपनी अलग थ्योरी और प्रेक्टिसेस  हों। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने परीक्षा प्रणाली का ढांचा पहले ही तय कर रखा है। विश्वविद्यालयों को इसके अनुसार अपनी योजना बनानी चाहिए। यदि सभी कृषि विश्वविद्यालय एक ही जैसा और बिना किसी क्षेत्रीय भिन्नता के पाठ्यक्रम चलाएंगे, तो अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग कृषि विश्वविद्यालयों को बनाए रखने का कोई औचित्य नहीं रह जाएगा। हर विश्वविद्यालय की अपनी एक क्षेत्रीय विशेषता होनी चाहिए।

डॉ. एनएस राठौड़, पूर्व डीडीजी(शिक्षा), आईसीएआर, नई दिल्ली


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