सर्दी में गर्मी का अहसास, पश्चिम में बारिश का अलर्ट
(सभी तस्वीरें- हलधर)जयपुर। पश्चिमी विक्षोभ के सक्रिय होने से सर्दी, गर्मी का अहसास करवा रही है। दिन-रात के तापमान में बढौत्तरी दर्ज हुई है। वहीं, प्रदेश में रबी फसलों की बुवाई का काम अंतिम चरण में है। हालांकि, प्रदेश के मैदानी इलाकों में तेज सर्दी का असर बना हुआ है। लेकिन, शहरी क्षेत्रों में सर्दी असर नहीं दिखा पा रही है। उधर, खेतों में भी पीला सोना चमकने लगा है। वहीं, चने में भी फलाव आना शुरू हो चुका है। गौरतलब है कि रबी फसलों की बुवाई एक करोड़ 20 लाख हैक्टयर लक्ष्य की तुलना में 93 फीसदी बुवाई हो चुकी है। कृषि विभाग का कहना है कि सभी रबी फसलों का बुवाई क्षेत्र पिछले वर्ष से काफी बढ़ा है। बता दें कि जौ और चना बुवाई ने अपना लक्ष्य पार कर लिया है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार मौसम में आ रहे बदलाव को देखते हुए सरसों-चना उत्पादक किसानों को सतर्क रहने की जरूरत है। आपको बता दें कि सरसों की बुवाई 36 लाख हैक्टयर के मुकाबले 33.81 लाख हैक्टयर क्षेत्र में हो चुकी है। बुवाई का यह आंकड़ा गत वर्ष समानावधि से अधिक है। पिछले साल समानावधि में 32.89 लाख हैक्टयर में सरसों की बुवाई हुई थी।

फल-सब्जी का पाले से बचाव
बारानी कृषि अनुसंधान केन्द्र, भीलवाड़ा के कृषि वैज्ञानिक डॉ. केसी नागर के मुताबिक जाड़े और पाले से सब्जियों को बचाने के लिए सब्जियों के आसपास ईंधन जलाकर धुआं करने से फायदा होता है। इसके अलावा सब्जियों को पतले कपड़े से ढंक दिया जाए ताकि, पौध पाले से बची रहे। कपड़े को दिन के वक्त हटा देना चाहिये। ताकि, धूप में पौधे अपना भोजन बनाने की प्रक्रिया को सुचारू तौर पर चला सके। इसके अलावा हल्की नियमित सिंचाई से भी सब्जियों को नुकसान से बचाया जा सकता है।
पशुपालन पर भी असर
कृषि विज्ञान केन्द्र, भीलवाड़ा के डॉ. सीएम यादव ने सर्दी की वजह से पशुओं ने चारा-पानी कम कर दिया है। इस कारण दुधारू पशुओं का दूध कम होने लगा है। वहीं जुकाम का असर होने से पशुओं के नाक और मुंह से लार गिरने लगी है। विभाग के अनुसार जुकाम बढऩे से निमोनिया और बुखार आदि बीमारी भी हो सकती है।
फलदार पौधों का बचाव ऐसे
वैज्ञानिकों ने बताया कि मौसम में 2 डिग्री से भी कम तापमान होने पर फलों के पौधों में नुकसान ज्यादा होने लगता है। ऐसे में छोटे और बड़े पौधों की दो तरह से सुरक्षा की जा सकती है। छोटे पौधों की सुरक्षा के लिए मल्चिंग करके यानि पराली, भूसा अथवा बाजरे की कड़बी को बिछाकर पौधों को गर्मी दी जाती है। वहीं थैटींग करके अजैविक माध्यम यानि पॉली अथवा मैट से पौधों को ढांपकर पाले से बचाया जाता है। इसके अलावा किन्नू, अमरूद, अनार, आंवला, मौसमी, माल्टा आदि के बड़े पौधों की सुरक्षा के लिए पतली नालियां बनाकर नियमित सिंचाई करें।
जीरे में चरमा की संभावना
वैज्ञानिकों ने किसानों को सलाह दी है कि बादल छाये रहने से जीरे की फसल में चरमा रोग फैल सकता है। रोग से बचाव हेतु कार्बेन्डाजिम 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर फ सल पर छिडक़ाव करें। इसबगोल की फसल में तुलासिता रोग की संभावना है। नियंत्रण के लिए किसान मेंन्कोजेब 2 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से छिडक़ाव करें।
सरसों में कीट- रोग
मौसम परिवर्तन से सरसों की फसल में कीट-रोग का प्रकोप बढऩे की संभावना है। इस फसल में झुलसा, तुलासिता, सफेद रोली जैसे रोग के साथ-साथ एफि ड़ (माहु या चैंपा) कीट प्रकोप की संभावना है। कृषि अनुसंधान अधिकारी डॉ. जितेन्द्र शर्मा ने बताया कि सफेद रोली, झुलसा और तुलासिता रोग नियंत्रण के लिए किसान भाई फसल के 45, 60 और 75 दिन बाद कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 2.5 से 3 ग्राम प्रति लीटर पानी अथवा मैन्कोजेब 2 ग्राम प्रति लीटर पानी के हिसाब से घोल बनाकर छिडक़ाव करें।
बुवाई क्षेत्र लाख हैक्टयर में।