अफ्रीकी स्वाइन फीवर का स्वदेशी टीका विकसित

नई दिल्ली 07-Aug-2026 05:13 PM

अफ्रीकी स्वाइन फीवर का स्वदेशी टीका विकसित

(सभी तस्वीरें- हलधर)

ईसीएआर-राष्ट्रीय उच्च सुरक्षा पशु रोग संस्थान के वैज्ञानिकों बड़ी कामयाबी हाथ लगी हैं  संस्थान के वैयानिको ने अफ्रीकी स्वाइन फीवर की रोकथाम के लिए पहला स्वदेशी टीका विकसित किया है। इस टीके को  एमए-104 (MA-104) सेल लाइन आधारित जीवित क्षीणित एएसएफ नाम दिया है। इसे विशेष जीन विलोपन वाले एएसएफ वायरस जीनोटाइप-II का उपयोग कर तैयार किया गया है।  यह टीका आठ सप्ताह या उससे अधिक आयु के स्वस्थ सूअरों के लिए अनुशंसित है। इसे 1 मिलीलीटर इंट्रामस्कुलर (मांसपेशी) इंजेक्शन के रूप में लगाया जाएगा। पहली खुराक के 14 दिन बाद बूस्टर डोज दी जाएगी, जिससे बेहतर प्रतिरक्षा विकसित हो सके।

परीक्षण में सुरक्षित और प्रभावी साबित

आईसीएआर ने बताया कि टीके का प्रयोगशाला में व्यापक परीक्षण किया गया है। इसमें रोगाणुहीनता, शुद्धता, सुरक्षा, आनुवंशिक स्थिरता, प्रतिरक्षाजनकता, सुरक्षात्मक प्रभावकारिता और विषाणु परिवर्तन संबंधी अध्ययन सफल रहे हैं। इसके अलावा मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय के पशुपालन एवं डेयरी विभाग के सहयोग से इसका क्षेत्रीय सत्यापन भी किया गया, जिसमें टीका सुरक्षित और प्रभावी पाया गया।

क्या है अफ्रीकी स्वाइन फीवर 

अफ्रीकी स्वाइन फीवर  एक अत्यंत संक्रामक और घातक वायरल बीमारी है, जो घरेलू और जंगली दोनों प्रकार के सूअरों को प्रभावित करती है। इस बीमारी में तेज बुखार, रक्तस्राव और लगभग 100 प्रतिशत तक मृत्यु दर देखी जाती है। भारत में इसका पहला मामला वर्ष 2020 में सामने आया था। इसके बाद यह कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में फैल गया, जिससे हजारों सूअरों की मौत हुई और सूअर पालन व्यवसाय को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा।

करोड़ों रुपये का नुकसान

आईसीएआर के अनुसार, वर्ष 2020 और 2021 में असम में हुए शुरुआती प्रकोप के दौरान सूअरों की मौत और उन्हें मारने की कार्रवाई से लगभग 276 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। वहीं, मिजोरम में वर्ष 2025 तक एएसएफ के प्रकोप से 11,382 से अधिक परिवार प्रभावित हुए और करीब 982 करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान हुआ। इन परिस्थितियों ने देश में प्रभावी स्वदेशी टीके की आवश्यकता को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया।


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