बकरी पालन बिजनेस प्लान 2026 कमाई नस्ल खर्च मुनाफा जानकारी
(सभी तस्वीरें- हलधर)बकरी एक पालतू पशु है, जिसे दूध और मांस के लिये पाला जाता है। इसके अतिरिक्त इससे रेशाए चर्मए खाद- बाल प्राप्त होता है। बकरी पालन का एक लाभकारी पहलू यह भी है कि इसे बच्चे और महिलाएं आसानी से पाल सकते हैं। वर्तमान में बकरी व्यवसाय की लोकप्रियता और सफलता की अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि देश के विभिन्न प्रान्तों में इसका व्यवसायीकरण हो रहा है। औद्यौगिक घराने और व्यवसायी बकरी पालन पर प्रशिक्षण प्राप्त आगे रहे हैं और बडे-बड़े बकरी फार्म सफलतापूर्वक चल रहे हैं। भारत की कृषि आधारित अर्थव्यवस्था में बकरी जैसा छोटे आकार का पशु भी महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। ऊंची वार्षिक वध दर के बावजूद विकासशील देशों में बकरियों की संख्या में निरंतर वृद्धि इनके सामाजिक और आर्थिक महत्व का दर्शाती है।
महत्वपूर्ण तथ्य
उचित नस्ल का चुनाव
प्रजाति का सुधार
बकरी पालक को चाहिए कि स्थानीय माँग के अनुसार अर्थात दूध के लिए जमुनापारी तथा मांस उत्पादन के लिए बरबरी नस्ल का पालन करें अथवा देशी प्रजाति को शुद्ध जमुनापारी या बरबरी से प्रजनन (क्रास) कराकर धीरे-धीरे अनुवांशिक सुधार करें। इसके लिए व्यवस्थित अथवा सरकारी फार्म से अच्छे गुणों वाला नर बच्चा क्रय करें। प्रति 20-25 बकरियों के लिए एक नर पर्याप्त होता है। एक साल बाद यह प्रजनन योग्य हो जाता है। उसके साथ के अन्य देशी नर बकरों को बेच दें अथवा बंध्याकरण करा दें । ताकि अन्त: प्रजनन को रोका जा सके। इस तरह किसान अवर्णित नस्ल के समुदाय को कम खर्च द्वारा 2-3 वर्ष में वांछित नस्ल में परिवर्तित कर अधिक लाभ कमा सकते हैं।
प्रजनन हेतु बकरे का चुनाव
नस्ल सुधार में बकरे का योगदान आधा होता है। अत: समुदाय में सबसे स्वस्थ, निरोग, तेज वृद्धि दर, सुडौल शरीर, अधिक शारीरिक भार (वसा रहित) तथा फूर्तीले नर का चुनाव प्रजनन हेतु करना चाहिए। इसके अतिरिक्त नर का चुनाव करते समय इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि इसकी माँ एक समय में ज्यादा बच्चे देती हो तथा दो ब्यात के बीच कम से कम अंतराल रखती हो।
आवास व्यवस्था
आवास सदैव ऊँचे और सूखे स्थान पर बनायें जहाँ नमी अथवा पानी न रहता हो। प्रत्येक पशु को कम से कम 1.00 वर्ग मी. स्थान देना चाहिए। आवास तक सूर्य की रोशनी पहुँचनी चाहिये। मई-जून में अत्यधिक तापमान और दिसम्बर-जनवरी में अत्यधिक शीत से बचाव हेतु छायेदार वृक्ष तथा पर्दे आदि की व्यवस्था करनी चाहिए। बीमारी से बचाव के लिए नियमित मल-मूत्र की सफाई करते रहना चाहिए।
प्रजनन व्यवस्था
प्रजनन के लिए प्रति 20-25 मादा पर एक नर बकरा रखना चाहिए। बकरी पालक उचित रख-रखाव और आहार प्रबंधन करें । ताकि बकरी ब्यात के पश्चात तीन माह के अंदर पुन: गर्भधारण कर ले जिससे दो साल में तीन ब्यात मिल सके। बकरियों में मद चक्र 18-21 दिन तथा मद अवधि 24-48 घंटे का होता है। मद के लक्षण आने के 12 घंटे पश्चात इनका प्रजनन कराना चाहिये। बकरी पालक इस बात का ध्यान दें कि गर्भित कराने के पश्चात उनकी बकरी में 18-21 दिन के बीच पुन: मद के लक्षण तो नहीं दिखाई दे रहा है। यदि ऐसा है तो पुन: गर्भित करायें। लेकिन, बार-बार ऐसा हो तो पशु-चिकित्सक की सलाह लें।

नवजात बच्चे की देखभाल
बच्चे को बकरी का पहला दूध (खीस) 2-3 दिन तक अवश्य पिलायें। इससे बीमारियों से बचाव में मदद मिलती है। नाल पर टिंचर आयोडिन लगाते रहना चाहिए। बच्चे को दिन में तीन-चार बार दूध पिलाएँ। माँ के दूध के अभाव में गाय का दूध पिलाया जा सकता है। दो-तीन सप्ताह बाद मुलायम हरा चारा देना प्रारम्भ करें। तीन सप्ताह में नर बच्चे का बंध्याकरण कराए, इससे मांस की गुणवत्ता बढ़ जाती है तथा जो चमड़ा प्राप्त होता है उसमें कोई दुर्गंध नहीं होती है। दो माह बाद बच्चे को दूध देना आवश्यक नहीं है।
आहार व्यवस्था
यदि अच्छा चारागाह, झाडिय़ाँ और पौष्टिक हरा चारा उपलब्ध हो तो दाना मिश्रण देना आवश्यक नहीं है। अन्य परिस्थितियों में बढ़ते बच्चे को 100 ग्रा. दाना मिश्रण, प्रजनन के मौसम में नर को 200 ग्राम गर्भित बकरियों (अंतिम 60 दिन) को 200 ग्राम और एक ली. दूध देने वाली बकरियों को प्रति दिन 250 ग्रा. दाना मिश्रण देना चाहिए। दाना मिश्रण बनाने के लिए कोई भी सस्ता अनाज 50-60 प्रतिशत, दाल चूनी 20 प्रतिशत, खली 25 प्रतिशत, गेहूँ का चोकर या चावल का पालिस 10 प्रतिशत, खनिज मिश्रण 2 प्रतिशत तथा साधारण नमक 1 प्रतिशत स्थानीय उपलब्धता के आधार पर चयन कर तैयार करें। बकरियों का धीरे-धीरे आहार परिवर्तन करें। अधिक रसीला चारा जैसे बरसीम, लूसर्न, लोबिया अधिक मात्रा में न खिलाएं इससे अफरा हो सकता है। सुबह अतिशीघ्र जब तक घासों पर ओस लगा हो तथा जलभराव क्षेत्रों में बकरियों को चरने न भेजें इससे अन्त: परजीवी का प्रकोप हो सकता है।
स्वास्थ्य व्यवस्था
बकरी पालक को हमेशा सतर्क रहना चाहिए कि कहीं उनकी बकरी बीमार तो नहीं है। बकरी का समुदाय से अलग रहना, चराई नहीं करना, साथ-साथ न चल पाना, सुस्त और उतरा चेहरा, सर नीचे करके खड़े होना, शरीर का तापमान 1030 फा. से ज्यादा होना, मुँह, नाक, कान, आँख अथवा मल-मूत्र के रास्ते खून, मवाद, कीचड़ आना आदि बीमारी के लक्षण हैं। ऐसी दशा में तुरंत पशु-चिकित्सक से सलाह लें।
बकरी पालन की विशेषताएं