पशुओं में संक्रामक रोग: लक्षण, बचाव और जरूरी टीकाकरण की पूरी जानकारी 

नई दिल्ली 23-Sep-2026 12:36 PM

पशुओं में संक्रामक रोग: लक्षण, बचाव और जरूरी टीकाकरण की पूरी जानकारी 

(सभी तस्वीरें- हलधर)

पशुधन को अधिकतर किसान अतिरिक्त आय स्रोत के रूप में देखते हैं। गुणवत्तापूर्ण दूध और बेहतर आमदनी प्राप्त करने के लिए पशुओं को स्वस्थ रखना जरूरी है। इसके लिए पशुपालकों के लिए आवश्यक है कि वह अपने पशुओं को रोगों से दूर रखें। संक्रामक रोगों से कुछ रोग ऐसे होते हैं, जिनका कोई उपचार नहीं होता है। ऐसी स्थिति में उपचार से बचाव अच्छा का रास्ता ही उचित होता है। संक्रामक रोगों को रोकथाम के लिए आवश्यक है कि पशुओं में रोग रोधक टीके निर्धारित समय पर लगाएं।

रोगी पशु के सामान्य लक्षण

पशु खाने-पीने में रुचि नहीं लेता है। पशु सुस्त और कमजोर हो जाता है। उसकी आदतों और व्यवहार में परिवर्तन होता है। थूथन गीले की जगह सूखा रहता है। गोबर और लीद पतली, बदबूदार और आंव वाली हो जाती है। पशु की त्वचा ढीली व सूखी हो जाती है। बाल खड़े रहते हैं। पशु के उत्पादन में अचानक कमी हो जाती है। रोगी पशु में कई बार शारीरिक कंपन, हांफना, मुंह से लार गिरना, दांत किटकिटान आदि लक्षण दिखाई देते हैं।

संक्रामक रोग से मृत पशु के शवों का निस्तारण

क्या करें!

  • संक्रामक रोग से मृत पशु के शव को गड्ढा खोदकर दबा देना चाहिए।

  • गड्ढा लगभग 1.5 मीटर गहरा खोदकर शव पर नमक और चूने की परत बिछा दें।

  • मृत पशु का मल-मूत्र, चारा बिछावन अथवा खून जैसे उत्सर्जित पदार्थों को गड्ढे में शव के साथ डाल दें।

  • पशु बाड़े में शव स्थान पर चूना, पानी, फिनायल या ब्लीचिंग पाउडर से अथवा कागज जलाकर आग लगाकर स्थान को शुद्ध करें।

क्या न करें !!

  • खुले मैदान, नदी अथवा तालाब में नहीं फेंकें।

  • शव की खाल न उतारें।

  • चील, कौवों और कुत्तों के लिए खुला ना छोड़ें जो कि इस संक्रमण को एक स्थान से दूसरे स्थान पर फैलाते हैं।

  • बिना स्थान शुद्ध किए स्वस्थ पशु को उस स्थान पर ना बांधें।

संक्रामक रोग प्रकोप होने पर बचाव के उपाय

  • संक्रामक रोग के प्रारंभिक लक्षण दिखते ही रोगी पशु को दूसरे स्वस्थ पशुओं से अलग स्थान पर रखें।

  • रोगी पशु को दाना, चारा और पानी की व्यवस्था अलग बर्तनों में करें। रोगी पशु के उपचार के लिए पशु चिकित्सक से संपर्क करें। पशु चिकित्सक द्वारा संक्रामक रोग होने की जानकारी देने पर, रोगी पशु के उपचार के साथ-साथ पशु चिकित्सक की सलाह से आसपास के स्वस्थ पशुओं में टीकाकरण कराएं।

  • रोग ग्रस्त क्षेत्र में पशुओं का आवागमन नहीं करें। पशुपालक सर्वप्रथम स्वस्थ पशु का दूध निकालने तत्पश्चात रोगी पशु का दूध निकालें और हाथ, बर्तन आदि को एंटीसेप्टिक घोल जैसे लाल दवा, डिटॉल आदि से साफ करें। संक्रामक रोग से मृत पशु को गांव के बाहर लगभग 1.5 मीटर गहरे गड्ढे में चूने अथवा नमक के साथ दबा दें। मृत पशु के संपर्क में रही वस्तुओं और स्थान को भी फिनायल, लाल दवा आदि से कीटाणु रहित करें।

पशुओं में होने वाले प्रमुख संक्रामक रोग (तालिका)

 

बीमारी का नाम

रोग से ग्रसित होने वाले पशुधन

रोग उत्पत्ति के कारण

रोग के प्रमुख लक्षण

चाव हेतु टीका लगाने का उचित समय

एचएस (गलघोंटू/घुरका)

गाय, भैंस, भेड़-बकरी

पाश्चुरेला मल्टोसिडा नामक जीवाणु

तेज बुखार (105-107°F), आंखें लाल, सूजी, नाक व मुंह से पानी गिरना, गले के नीचे दर्दकारी सूजन, सांस लेने में कठिनाई, सांस घुटने से घर-घर आवाज आना, दम घुटने से मृत्यु।

मानसून पूर्व

बीक्यू (लंगड़ा बुखार)

गाय, भैंस, भेड़-बकरी (कम उम्र के वयस्क पशुओं में संभावना अधिक)

क्लॉस्ट्रिडियम चौवई नामक जीवाणु

तेज बुखार, आंखें लाल, पुट्ठे पर गर्म सूजन जो बाद में ठंडी हो जाती है। सूजन को दबाने पर चर-चर की आवाज आती है। लंगड़ापन।

मानसून पूर्व

एंथ्रेक्स

गाय, भैंस, भेड़-बकरी

बैसिलस एंथेसिस नामक जीवाणु

अचानक बीमार होना, चक्कर और बैचैनी से अचानक मृत्यु। खूनी दस्त। पशु के प्राकृतिक छिद्र जैसे मुंह, नाक एवं मल-मूत्र द्वार से गहरा लाल रंग का गाढ़ा रक्त निकलना।

एफएमडी (खुरपका-मुंहपका)

 

गाय, भैंस, बकरी, भेड़-ऊंट

विषाणु जनित

तेज बुखार, लार छूटना। सुस्त हो सिर लटकाए रखना। मुंह-जीभ में छाले। खुरों के बीच में जख्म व मवाद पड़ना, पैरों से लंगड़ाना।

नवम्बर-दिसम्बर, जून-जुलाई

आरपी (पशुप्लेग/पोकना)

गाय, भैंस, भेड़-बकरी

विषाणु जनित

तेज बुखार; जीभ, होंठ पर लाल पीले छाले; मुंह और नाक से स्राव आना। दूसरे दिन से तेज पतले बदबूदार और बदबूदार दस्त, बाद में खूनी दस्त।

 


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