श्वेत क्रांति का नया दौर, फसलों को पछाड़कर 'किसान का एटीएम' बना डेयरी क्षेत्र
श्वेत क्रांति का नया दौर, फसलों को पछाड़कर 'किसान का एटीएम' बना डेयरी क्षेत्र
(सभी तस्वीरें- हलधर)राजस्थान के ग्रामीण परिदृश्य में पशुपालन और डेयरी क्षेत्र अब केवल एक सहायक व्यवसाय नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सबसे मजबूत स्तंभ के रूप में उभरा है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व में पिछले दो वर्षों में राज्य सरकार द्वारा उठाए गए कदमों ने राजस्थान को 'श्वेत क्रांति' के एक नए युग में प्रवेश करा दिया है।
अर्थव्यवस्था में फसलों से आगे निकला पशुधन
राजस्थान आर्थिक समीक्षा 2025-26 के अग्रिम अनुमानों ने एक चौंकाने वाला और उत्साहजनक डेटा पेश किया है। इस वर्ष पशुधन क्षेत्र का सकल मूल्य वर्धन (GSVA) प्रचलित कीमतों पर 2.17 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। यह कृषि और सम्बद्ध क्षेत्रों के कुल योगदान का 49.35 प्रतिशत है, जो कि फसलों के हिस्से (42.61 प्रतिशत) से भी काफी अधिक है। यही वजह है कि डेयरी क्षेत्र अब किसानों के लिए एक ‘स्थिर एटीएम’ की भूमिका निभा रहा है।
रिकॉर्ड दुग्ध संकलन और क्षमता विस्तार
राज्य में आरसीडीएफ (RCDF) के माध्यम से दुग्ध संकलन और प्रसंस्करण के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति हुई है:
'सरस' का राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ता दबदबा
मार्केटिंग नेटवर्क के विस्तार से डेयरी उत्पादों के विपणन में 15 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। 'सरस' अब केवल राजस्थान तक सीमित नहीं है। दिल्ली-एनसीआर, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश तक सरस के उत्पादों का विस्तार किया जा रहा है। धार्मिक और पर्यटन स्थलों पर नए सरस बूथ, कैफे और सरस प्लाजा स्थापित किए जा रहे हैं।
पशुपालकों की झोली में 700 करोड़ का अतिरिक्त लाभ
सरकार ने दूध के क्रय मूल्य में वृद्धि कर पशुपालकों को सीधे लाभ पहुँचाया है, जिससे उन्हें वर्ष 2025-26 में 700 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भुगतान प्राप्त हुआ है। इसके अतिरिक्त, मुख्यमंत्री दुग्ध उत्पादक संबल योजना के तहत 5 रुपये प्रति लीटर की सब्सिडी के माध्यम से पिछले दो वर्षों में 1,386 करोड़ रुपये का अनुदान सीधे लाभार्थियों को दिया गया है।
मिलावट पर लगाम और सहकारिता का विस्तार
'शुद्ध के लिए युद्ध' की तर्ज पर डेयरी क्षेत्र में 'सरस अमृतम' और 'दूध का दूध पानी का पानी' जैसे अभियान चलाए जा रहे हैं। गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए डिजिटल मॉनिटरिंग और आधुनिक मशीनों का सहारा लिया जा रहा है। वहीं, पिछले दो वर्षों में 3,525 नई डेयरी सहकारी समितियों के गठन ने इस नेटवर्क को गांव-गांव तक पहुंचा दिया है।