वैज्ञानिक बकरी पालन प्रबंधन: नस्ल, आहार, आवास और रोग नियंत्रण गाइड
(सभी तस्वीरें- हलधर)पशुपालक भाईयो जैसा कि आप सभी जानते हो कि अगर वैज्ञानिक तरीके से बकरी पालन किया जाए तो वर्तमान में बकरी पालन आमदनी का सबसे अच्छा स्त्रोत है। बकरी एक बहुउपयोगी और सीधा साधा जानवर है। कोई भी व्यक्ति कम पूंजी और कम साधन से इस वव्यसाय को शुरू कर सकता है। बकरी पालक उचित रखरखाव, संतुलित पोषाहार और बेहतर प्रबंधन से बकरियों को रोगग्रस्त होने से बचाकर अच्छा लाभ कमा सकता है।
बकरीपालन की शुरूआत
बकरी पालन की शुरुआत कैसे करें? इसके लिए सबसे महत्वपूर्ण है बकरी की अच्छी नस्ल का चयन करें। बकरी का चयन जैसे दूध, मांस, खाल, बालों इत्यादि के उत्पादन के लिए करते। बकरियों के दूध बेचकर, मांस, खाल और मिंगनियो को खाद के रूप में बेचकर आर्थिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं। ज्यादातर पशुपालक मांस उत्पादन के रूप में बकरियों को पालते हैं।
बकरियों की उन्नत नस्ल
राजस्थान में पाए जाने वाले बकरियों की प्रमुख नस्लों में जमनापुरी, मारवाड़ी, सिरोही, बीटल, जखराना, बरबरी, सूरती, तोतापारी, गुर्जरी आदि है।

आहार वव्यस्था
सामान्यतया बकरिया सभी प्रकार की वनस्पति खा लेती हैं । पर बबूल, खेजड़ी की लूंग, बैर का पाला, नीम, आम, जामुन इत्यादि की पत्तियां बड़े चाव से खाते है। बकरिया अपने शारीरिक भार का 3-3.5 प्रतिशत शुष्क पदार्थ खा सकती है। बकरियों की अच्छी वृद्धि और अच्छे उत्पादन के लिए दाना मिश्रण भी देना चाहिए। जैसे चना, जौ, मक्का, मूंगफ ली खल, गेहूं का चोकर इत्यादि को थोड़ी-थोड़ी मात्रा में मिश्रित करके और मिनरल मिक्सर 1 प्रतिशत, थोड़ा नमक 0.5 प्रतिशत मिलाना चाहिए। दूध देने वाली और गर्भित बकरियों को प्रतिदिन 400-500 ग्राम और छोटी बकरियों को 200-250 ग्राम दाना मिश्रण देना चाहिए।
बकरियों में प्रजनन
सामान्यतया बकरी 8-12 माह की उम्र में हीट में आने लगती है। लेकिन 15-18 माह की उम्र में गर्भित कराना चाहिए। ताकि, बकरी का शारीरिक भार (लगभग 20-25 किलो हो) और अच्छा उत्पादन दे सके। बकरी एक से दो दिन तक ताव में रहती तो ताव में आने के लगभग 24 घंटे के बाद ही गर्भित कराना चाहिए। बकरियों में गर्भावस्था 145-150 दिन की होती हैं इस दौरान बकरी की अच्छी देखभाल करना जरूरी होता है।
बकरियों में होने वाले प्रमुख रोग
बकरियों में मुख्य रूप से खुरपका, मुंहपका, माता रोग और फ ड़किया रोग मुख्य रूप से होते हैं। साथ ही, कई जीवाणु, विषाणु और परजीवी जनक रोग भी होते हैं। इन सबसे बचने के लिए बकरियों की समय पर टीकाकरण और कृमिनाशक दवा देनी चाहिए।