राजस्थान में पशु जैव विविधता: आवश्यकता और चुनौतियां
(सभी तस्वीरें- हलधर)राजस्थान की पशु जैव विविधता न केवल राज्य की पहचान है। बल्कि, यह संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र के लिए भी अत्यधिक महत्वपूर्ण है। जैव विविधता के संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता है, जिसमें सरकार, स्थानीय समुदायों, वैज्ञानिकों और पर्यावरण प्रेमियों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। यदि हम इस दिशा में सही कदम उठाते हैं, तो राजस्थान की अद्भुत और विविध पशु प्रजातियाँ आने वाली पीढिय़ों के लिए संरक्षित रह सकती हैं।
समृद्ध जैव विविधता
राजस्थान की जैव विविधता अत्यधिक समृद्ध है। यहाँ के विभिन्न भौगोलिक और पारिस्थितिकी तंत्रों में अनेक प्रकार की वन्यजीवों और पशुओं की प्रजातियाँ पाई जाती हैं। राजस्थान में रेगिस्तान, पहाड़ी क्षेत्र, घास के मैदान और नदी-तटीय क्षेत्रों जैसे विभिन्न पारिस्थितिकी तंत्रों की उपस्थिति है, जो इसे जैव विविधता के संरक्षण के लिहाज से महत्वपूर्ण बनाती है।
पशु जैव विविधता
राजस्थान में पशु जैव विविधता का एक महत्वपूर्ण स्थान है। यहाँ कई दुर्लभ और संकटग्रस्त प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जिनमें मांसाहारी जानवर, शाकाहारी जानवर, पक्षी, और जलीय जीव शामिल हैं। राज्य में पाए जाने वाले प्रमुख जानवरों में एशियाई शेर, हिमालयी तेंदुआ , कालेभालू, सांभर, चीतल, ब्लैक बक, वाइल्ड बील,लंगूर* और विभिन्न पक्षी प्रजातियाँ जैसे ग्रेट इंडियन बस्टर्ड और कॉन्टिनेंटल लैपविंग शामिल हैं। राजस्थान के प्रमुख वन्यजीव अभयारण्यों और राष्ट्रीय उद्यानों में सांभर वन्यजीव अभयारण्य, रणथम्भौर राष्ट्रीय उद्यान, कैलादेवी अभयारण्य, और डेजर्ट नेशनल पार्क जैसे स्थान शामिल हैं, जो विभिन्न पशु प्रजातियों का घर हैं।

प्राकृतिक संसाधनों की कमी
जलवायु परिवर्तन और सूखा जैसी प्राकृतिक आपदाएँ, जो राजस्थान में सामान्य हैं, जानवरों के लिए जीवनदायिनी संसाधनों की कमी का कारण बन सकती हैं। यह जैव विविधता को खतरे में डाल सकता है।
अवैध शिकार और व्यापार
अवैध शिकार और वन्यजीवों का अवैध व्यापार भी एक बड़ा खतरा है, जो कई दुर्लभ प्रजातियों की सघनता को घटा रहा है।

>>संरक्षित क्षेत्रों का विस्तार : राज्य में वन्यजीवों के लिए सुरक्षित आवास सुनिश्चित करने के लिए और संरक्षित क्षेत्रों को बढ़ाने की आवश्यकता है। अधिक से अधिक क्षेत्रों को राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों के रूप में घोषित किया जाना चाहिए।
>>स्थानीय समुदायों की भागीदारी: स्थानीय समुदायों को वन्यजीव संरक्षण में भागीदार बनाना अत्यंत महत्वपूर्ण है। इन समुदायों को वन्यजीवों के महत्व के बारे में जागरूक करने से संरक्षण प्रयासों में मदद मिल सकती है।
>>विज्ञान और अनुसंधान : जैव विविधता के संरक्षण के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान का महत्व है। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि किस तरह के प्रयासों से राज्य में प्रजातियों की संख्या बढ़ाई जा सकती है।
>>कानूनी संरचना : राज्य और केंद्र सरकारों द्वारा वन्यजीवों के संरक्षण के लिए सख्त कानूनों का पालन सुनिश्चित करना आवश्यक है। वन्यजीवों की तस्करी और शिकार पर रोक लगाने के लिए प्रभावी नीतियाँ बनानी चाहिए।
>>जागरूकता और शिक्षा : स्थानीय निवासियों और पर्यटकों के बीच वन्यजीव संरक्षण के महत्व के बारे में शिक्षा और जागरूकता फैलाना बेहद जरूरी है। जागरूकता का यह कार्य पशु जैव विविधता केंद्र राजूवास बीकानेर कर रहा है। इसके माध्यम से लोग प्राकृतिक संसाधनों के प्रति जिम्मेदार बने रह सकते हैं।