500 से 700 रुपए किलो बिकता है शहद, किसान ने अपनाया नया कारोबार
(सभी तस्वीरें- हलधर)
भदेसर, चित्तौडग़ढ़। खेत वही है, मेहनत वही है। लेकिन, कमाई का तरीका बदल गया तो कंचन देवी की जिंदगी भी बदल गई। परिवार की 6 बीघा जमीन पर पारंपरिक खेती से होने वाली सीमित आमदनी के बीच उन्होंने कुछ नया करने का फैसला किया। राजीविका के मार्गदर्शन और प्रशिक्षण ने उन्हें मधुमक्खी पालन की राह दिखाई। महज 15 मधुमक्खी बॉक्स से शुरू हुआ यह सफर आज 150 बॉक्स तक पहुंच चुका है। अब हर साल करीब 4 से 5 क्विंटल शहद का उत्पादन कर कंचन देवी इसे 500 से 700 रुपए प्रति किलो तक की दर से बेच रही हैं। किसान कंचन ने हलधर टाइम्स को बताया कि खेत, मधुमक्खियां और पशुधन—तीनों को एक-दूसरे से जोडक़र आमदनी का नया रास्ता तैयार किया है। कंचन देवी बताती हैं कि खेती से परिवार को सालाना करीब 50 से 60 हजार रुपए की आमदनी होती थी। बढ़ती जरूरतों के बीच यह आय पर्याप्त नहीं थी। ऐसे में खेती के साथ कोई ऐसी गतिविधि शुरू करने का विचार आया, जिससे कम जमीन में अतिरिक्त आमदनी हासिल की जा सके। इसी दौरान राजीविका के अधिकारियों से संपर्क हुआ। मधुमक्खी पालन का प्रशिक्षण लिया और 15 बॉक्स से शुरुआत की। शुरुआत में मौसम की मार और मधुमक्खियों में होने वाली बीमारियों जैसी चुनौतियां सामने आईं, लेकिन हिम्मत नहीं छोड़ी। अनुभव बढ़ता गया तो बॉक्स भी बढ़ते गए और मेरे पास पास 150 बॉक्स हैं। गौरतलब है कि कंचन के परिवार के पास 6 बीघा जमीन है। इस पर रबी-खरीफ फसलों का उत्पादन होता है।
जय मधुमक्खी ब्रांड नाम से शहद बिक्री
राजीविका की ओर से आयोजित मेलों और प्रदर्शनियों ने कंचन के उत्पाद को बाजार तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यहां शहद बेचने के लिए उन्हें मंच के साथ ठहरने और भोजन की सुविधा भी मिलती है। इससे उनके लिए उत्पादन के साथ विपणन की राह भी आसान हुई।
फसल उत्पादन में दिखा फायदा
उन्होनें बताया कि मधुमक्खी पालन को केवल शहद उत्पादन तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने अलग-अलग फसलों के आसपास मधुमक्खी बॉक्स लगाए। इससे मधुमक्खियों को पर्याप्त पराग और रस मिला, वहीं खेतों में प्राकृतिक परागण की प्रक्रिया भी बेहतर हुई।
पशुपालन से भी लाभ
उन्होने बताया कि पशुपालन में मेरे पास तीन गाय हैं, जिनसे प्रतिदिन करीब 8 से 10 लीटर दूध प्राप्त होता है। परिवार की जरूरत पूरी करने के बाद बचे दूध से वह घी तैयार करती हैं। पशुओं से मिलने वाला अपशिष्ट भी उनके लिए बेकार नहीं जाता। इसका उपयोग खेत में खाद के रूप में किया जाता है।