आईटीआई छोड़ खेती अपनाई, औषधीय फसलों से लाखों कमाता है किसान
(सभी तस्वीरें- हलधर)
देवलीकला, कोटा। समय पर सही मार्गदर्शन मिल जाएं तो खेतिहर के होनहारों को किसी के यहां नौकरी की जरूरत नहीं रहती। फुफाजी के नक्शे कदम पर चलकर कुछ ऐसा ही कर दिखाया है किसान नवीन अहीर ने। यह परम्परागत फसलों के साथ-साथ औषधीय फसलों का उत्पादन ले रहा है। वहीं, नारंगी का बगीचा भी समृद्धि बढ़ा रहा है। किसान नवीन का कहना है कि औषधीय फसलों से डेढ़ लाख रूपए प्रति बीघा की आमदनी मिल जाती है। गौरतलब है कि खेती से नवीन को सालाना 13-14 लाख रूपए की आमदनी मिल रही है। किसान नवीन ने हलधर टाइम्स को बताया कि परिवार के पास 30 बीघा जमीन है। परिवार की आर्थिक स्थिति शुरू से ही सामान्य रही है। मैने 10वीं पास करने के बाद आईटीआई की। लेकिन, इसके बाद खेती से जुड़ गया। उन्होंने बताया कि नारंगी का बगीचा पहले का है। लेकिन, फुफाजी को औषधीय फसलो की खेती करते देख मैने भी इस दिशा में कदम बढ़ाएं और कृषि आय बढाने में सफलता प्राप्त की। उन्होंने बताया कि सिंचाई के लिए ट्यूबवैल है। परम्परागत फसलों में मक्का, सोयाबीन, उड़द, गेहूं और चना का उत्पादन लेता हॅू। इन फलसों से सालाना 20-30 हजार रूपए प्रति बीघा की बचत मिल जाती है।
चिरायता-कस्तूरी भिंड़ी
उन्होंने बताया कि फुफाजी को औषधीय फसलो की खेती करते देखकर मैने भी इस ओर फोकस किया। वर्तमान में करीब 8 बीघा जमीन में चिरायता की बुवाई की हुई है। वहीं, दो बीघा क्षेत्र में कस्तूरी भिड़ी लगाई हुई है। उन्होंने बताया कि चिरायता की फसल से औसत डेढ़ लाख रूपए की आमदनी मिल जाती है। जबकि, भिड़ी से भी सवा लाख रूपए की प्रति बीघा आमदनी हो जाती है। यह फसल ऐसी है, जिनमें नुकसान नहीं उठाना पड़ता।
नारंगी बगीचे से 7 लाख
उन्होंने बताया कि टिकाऊ आय के लिए 12 बीघा जमीन में नारंगी का बगीचा लगाया हुआ है। बगीचे में 300 पौधें 8 साल के हो चुके है। जबकि, 200 पौधें तीन साल के हो चुके है। इससे सालाना 7 लाख रूपए की आमदनी खर्च निकालने के बाद हो जाती है।
धनिया-लहसुन भी लाभकारी
उन्होने बताया कि रबी में 10 बीघा क्षेत्र में लहसुन की बुवाई करता हॅू। इससे खर्च निकालने के बाद 35-40 हजार रूपए की बचत मिल जाती है। इसके अलावा धनिया फसल से भी अच्छी आमदनी हो जाती है।
पशुधन से आय
उन्होंने बताया कि पशुधन में मेरे 1 गाय और 13 भैंस है। प्रतिदिन 20 लीटर दुग्ध का उत्पादन मिलता है। इसमें से पशुधन का दैनिक खर्च निकालने के लिए आधा दुग्ध डेयरी को बिक्री कर देती हूॅ। शेष का उपयोग घी बनाने और परिवार की आवश्यकता पूर्ति में हो जाता है। पशु अपशिष्ट से कम्पोस्ट खाद बना रहा हॅू।
स्टोरी इनपुट:- एनबी मालव, उपनिदेशक उद्यान, कोटा