यूरिया-डीएपी नहीं, गोबर से खेती कर कमा रहे लाखों
(सभी तस्वीरें- हलधर)
कगाऊ, बाड़मेर। रसायनिक खेती के इस दौर में भी कई ऐसे किसान है, जिनकी याददाश्त में कभी यूरिया-डीएपी का नाम भी शामिल नहीं रहा। ऐसे ही किसान है धर्माराम लेघा, जो खेती से जुडऩे के बाद से ही गौ अधारित खेती करते आए है। उनका कहना है कि गोबर की खाद ही खेतों में डालता हॅू। फसल में कीट-रोग भी लगते रहे, कई बार नुकसान भी उठाना पड़ा। लेकिन, प्रकृति का साथ नहीं छोड़ा। बता दें कि किसान धर्माराम गौपालन आधारित खेती से सालाना 5 लाख रूपए की आमदनी प्राप्त कर रहे है। किसान धर्माराम ने हलधर टाइम्स को बताया कि स्कूल का मुंह दो-तीन क्लास के दौरान ही देखा। समय के साथ रोजगार की फ्रिक हुई तो खेती से जुड़ गया। उस समय खेती बरानी थी। पशुपालन ही आजीविका का मुख्य जरिया था। घी-छाछ-दही ही जुबानी स्वाद का साधन रहा। समय बदला, रसायन भी आए। लेकिन,खेतों को बिगाडऩे की दिल ने गवाही नहीं दी। शायद यही कारण है कि यूरिया-डीएपी जैसी खाद मेरी याददाश्त में भी शामिल नहीं है। सालभर के गोबर का परम्परागत तौर-तरीके से सड़ा गलाकर खेत में डाल देता हॅू। जो भी उपजता है, उससे परिवार का खर्च निकल जाता है। बता दें कि किसान धर्माराम ने थोड़ी-थोड़ी बचत से कुआं खुदवाया। इसके बाद रबी फसलों का उत्पादन लेना शुरू किया। इनके पास कुल 24 बीघा जमीन है। जिससे सालाना 4-5 लाख रूपए की आमदनी मिलने लगी है। उन्होने बताया कि परम्परागत फसलों में ईसबगोल, जीरा, रायड़ा, बाजरी, ग्वार, मूंग, मोठ का उत्पादन लेता हॅू।
मिश्रित बागवानी की ओर
उन्होंने बताया कि खेत में मिश्रित फलदार पौधें लगाए हुए है। लेकिन, ये पौधें शौक और ऋतु फल की आवश्यकता पूर्ति के लिए है। फलों की बिक्री नहीं करता हूॅ। फलदार पौधों में अनार, आंवला, बेर, करूंदा, गूंदा सहित करीब 50 तरह के फलदार पौधें शामिल है। इसके अलावा परिवार की आवश्यकता पूर्ति के लिए प्याज, मिर्च, टमाटर आदि फसलों का उत्पादन लेता हॅू।
घी से पशुपालन का खर्च
उन्होंने बताया कि पशुधन के लिए भी 3 बीघा क्षेत्र में जैविक नेपियर का उत्पादन लेता हॅू। पशुधन में मेरे पास 10 गाय है। गांव से दूध की बिक्री संभव नहीं है। इसलिए घी तैयार करता हॅू। घी की बिक्री पशुपालन का खर्च निकल जाता है। वहीं थोड़ी बहुत बचत मिल जाती है।
स्टोरी इनपुट: डॉ. हरखू देवी, डॉ. रावताराम भाखर पशुपालन विभाग, बाड़मेर