गेहूं की खेती में काढ़े का इस्तेमाल, 4 हजार रूपये बेची बोरी

नई दिल्ली 13-Apr-2026 02:34 PM

गेहूं की खेती में काढ़े का इस्तेमाल, 4 हजार रूपये बेची बोरी

(सभी तस्वीरें- हलधर)

केली, चित्तौडग़ढ़। शौखियों से आगे, आईना देखा है, प्राकृतिक के सफर में, हमने फायदा देखा है। जी हां, जमीन को काढ़ा पिलाकर माटी और मानुष को स्वस्थ करने का ऐसा ही बीड़ा उठाया है किसान प्रह्लाद उपाध्याय के। जिन्होंने जैविक से प्राकृतिक खेती की ओर कूच किया है। भले ही किसान उपाध्याय के पास जमीन कम है। लेकिन, अपने अनुभव से घर बैठे 4 हजार रूपए प्रति क्विंटल गेहूं की बिक्री कर अच्छा मुनाफा कमा रहे है। बता दें कि किसान प्रह्लाद प्राकृतिक खेती के मास्टर ट्रेनर भी है। साथ ही, एआई अभिकर्ता और कृषक मित्र के रूप में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। किसान प्रह्लाद ने हलधर टाइम्स को बताया कि वर्ष 1985 में 12वीं पास करने के बाद तीन साल बतौर अध्यापक सेवाएं दी। लेकिन, पारिवारिक परिस्थितियों के चलते नौकरी छोड़ दी। इसके बाद से खेती कर रहा हूँ। उन्होंने बताया कि मेरे पास 

दो से ढाई बीघा जमीन है। जमीन के इसी टुकड़े पर परिवार का आर्थिक चक्र घूमता है। मेरी खेती की शुरूआत रासायनिक खेती से हुई। लेकिन, बाद में रासायनिक खेती के नुकसान समझ आएं तो जैविक का सफर शुरू किया। लेकिन, अब प्राकृतिक खेती की ओर कदम बढ़ा चुका हॅू। गौरतलब है कि किसान प्रह्लाद गोपाल योजना में पशु मित्र और बाद में कृ षक मित्र के रूप में आम किसानों को बदलती कृषि के बारे में जागरूक करते आ रहे है। उन्होने बताया कि जैविक से प्राकृतिक बनने में कोई ज्यादा अंतर नहीं है। इससे कृषि लागत में काफी कमी आई है। वहीं, खेत में उत्पादित फसल घर बैठे की बेहतर आमदनी करवाने लगी है। उन्होने बताया कि परम्परागत फसलों में गेहूं, मेथी, लहसुन, सरसों का उत्पादन लेता हॅॅू। प्राकृतिक गेहूं 4 हजार रूपए प्रति क्विंटल की दर से बिक्री हो रहे है। 

माटी में बढ़ा जैविक कार्बन

उन्होंने बताया कि जैविक के बाद खेतों को प्राकृतिक के दायरे में लाने की कोशिश कर रहा हूँ। इसी का परिणाम है कि खेत की मृदा में जैविक कार्बन ऊपर आ रही है। गौरतलब है कि बेहत्तर उत्पादन और मृदा को स्वस्थ रखने के लिए जैविक कार्बन की मात्रा 5 प्रतिशत के करीब होना चाहिए। लेकिन, अंधाधुंध रसायन के उपयोग से मृदा में जैविक कार्बन की मात्रा घट रही है। उपज में स्थिरता के साथ कृषि लागत में बढ़ौतरी हो रही है। उन्होंने बताया कि शुरुआत में थोड़ी मुश्किल हुई। लेकिन, अब प्राकृतिक तौर-तरीकों से फसल उत्पादन की पूरी गणित समझ आ गई है। गौरतलब है कि केवीके ने उपाध्याय को प्राकृतिक खेती को मास्टर ट्रेनर बनाया है। साथ ही, इनके खेत पर प्राकृतिक खेती इकाई स्थापित की है।  

उन्नत पशुपालन

पशुधन में मेरे पास 2 गिर और एक एचएफ नस्ल की गाय है। प्रतिदिन 5-7 लीटर दूध का उत्पादन मिल रहा है। इसमें से एक समय का दुग्ध उपभोक्ताओं को 45 रूपए प्रति लीटर की दर से बिक्री कर देता हूॅ। इससे पशुधन का खर्च निकल जाता है। वहीं, पशु अपशिष्ट से जैविक कीटनाशक और वर्मी कम्पोस्ट, वर्मी वाश तैयार करके उपयोग में ले रहा हूँ। उन्होने बताया कि वर्मी की 4 बेड़ मेरे पास है। उत्पादित खाद खेत में काम आ जाती है। वहीं, के चुओं की बिक्री से सालाना 60 हजार रूपए की आमदनी मिल जाती है। 

स्टोरी इनपुट: डॉ. आरएल सोलंकी, केवीके, चित्तौडग़ढ़


ट्रेंडिंग ख़बरें