अनार की खेती से बदली किस्मत, 70 बीघा में 20 हजार पौधे

नई दिल्ली 01-Oct-2026 01:28 PM

अनार की खेती से बदली किस्मत, 70 बीघा में 20 हजार पौधे

(सभी तस्वीरें- हलधर)

जागसा, बालोतरा। कभी पानी की कमी और कम उत्पादन के चलते जिन रेतीले खेतों से सालाना 3 से 4 लाख रुपए की आमदनी होती थी, आज उन्हीं खेतों में अनार की बागवानी किसानों के लिए समृद्धि का नया रास्ता बन रही है। थार के रेतीले धोरों में अनार की खेती किसानों की आय बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रही है। इसकी मिसाल हैं किसान नाथू सिंह राजपूत, जो 70 बीघा जमीन में अनार की बागवानी कर सालाना करीब 2 करोड़ रुपए की आमदनी प्राप्त कर रहे हैं। किसान नाथू सिंह ने हलधर टाइम्स को बताया कि आठवीं कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़ खेती को अपना लिया। वर्ष 2011 में गांव के अन्य किसानों के साथ अनार की बागवानी शुरू की। शुरुआत में अनार के साथ परंपरागत फसलों का उत्पादन लेता रहा। लेकिन, अब  अब जमीन का  पूरा रकबा अनार के बगीचे में तब्दील हो चुका है। उन्होंने बताया कि अनार की खेती ने उनकी आर्थिक स्थिति बदल दी है। अब उन्होंने परंपरागत फसलों का उत्पादन पूरी तरह बंद कर दिया है।

70 बीघा में 20 हजार पौधे

किसान नाथू सिंह ने बताया कि उनके 70 बीघा क्षेत्र में करीब 20 हजार अनार के पौधे लगे हुए हैं। इन दिनों बगीचे में पौधों पर फल लदे हुए हैं। उन्होंने बताया कि अनार की फसल में खर्च निकालने के बाद एक पौधे से करीब एक हजार रुपए की आमदनी हो जाती है। इस हिसाब से बगीचे की संभावित आमदनी का अंदाजा लगाया जा सकता है। हालांकि, फसल की पैदावार और मुनाफा मौसम तथा कीट-रोगों के प्रकोप पर निर्भर करता है।

लॉटरी जैसी है अनार की फसल

नाथू सिंह का कहना है कि अनार की खेती उनके लिए लॉटरी जैसी साबित हुई है। जिस साल कीट और रोगों का प्रकोप कम रहता है, उस साल फसल से करोड़ों रुपए की आमदनी हो जाती है। वहीं, प्रतिकूल परिस्थितियों में उत्पादन और मुनाफा प्रभावित होता है। यही वजह है कि वे अनार की बागवानी में निरंतर मेहनत और फसल की देखभाल को जरूरी मानते हैं।

ड्रिप से पानी का बेहतर प्रबंधन

रेगिस्तानी क्षेत्र में पानी की कमी खेती के सामने बड़ी चुनौती है। ऐसे में नाथू सिंह ने अनार के बगीचे में ड्रिप सिंचाई प्रणाली अपना रखी है। इससे पौधों तक जरूरत के मुताबिक पानी पहुंचाया जाता है। अनार की बागवानी अपनाने के बाद उन्होंने पानी के बेहतर प्रबंधन और फसल की नियमित देखभाल पर विशेष ध्यान दिया है।

पशुधन से खाद और जैव कीटनाशक तैयार

खेती के साथ पशुपालन को भी मजबूती दी। उनके पास एक भैंस है, जिससे प्रतिदिन करीब 5 से 6 लीटर दूध मिलता है। दूध का उपयोग परिवार में करने के बाद शेष दूध से घी तैयार करता हॅू। इससे पशुपालन का खर्च निकालने में मदद मिलती है। वहीं, पशुओं के अपशिष्ट से वे कम्पोस्ट खाद और जैव कीटनाशक तैयार कर खेतों में उपयोग करता हॅू। 


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