बूंद-बूंद सरसब्ज होगी अरंडी, खत्म होगी विल्ट समस्या

नई दिल्ली 20-Apr-2026 05:19 PM

बूंद-बूंद सरसब्ज होगी अरंडी, खत्म होगी विल्ट समस्या

(सभी तस्वीरें- हलधर)

पीयूष शर्मा

जयपुर। अरंडी फसल को पाइपलाइन से सिंचाई देने वाले किसान थोड़ा सतर्क हो जाएं। क्योंकि सिंचाई का यह तरीका आपको आर्थिक नुकसान दे रहा है। यह बात हम नहीं, कृषि वैज्ञानिक कह रहे हैं। डॉ. बीआर चौधरी कृषि अनुसंधान केन्द्र, मंड़ोर (जोधपुर) द्वारा अरंड़ी में सिंचाई को लेकर किए शोध में यह तथ्य सामने आया है। शोध रिपोर्ट में कहा गया है कि पाइप लाइन से सिंचाई किसानों के लिए लाभकारी नहीं है। इससे उत्पादन में गिरावट आती है। साथ ही, पानी भी ज्यादा लगता है। गौरतलब है कि अरंडी की बुवाई जुलाई-अगस्त माह के दौरान होती है और मार्च तक यह फसल चलती है। ऐसे में इस फसल में कितना पानी लगता है, समझा जा सकता है। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि अरंड़ी की बेहत्तर पैदावार के लिए किसान बूंद-बूंद सिंचाई का उपयोग करें। इससे ना केवल जल की बचत संभव है। साथ ही उत्पादन में 20-40 फीसदी तक बढ़ोत्तरी होती है। कृषि वैज्ञानिक डॉ. रामेती जांगिड़ ने बताया कि पश्चिमी राजस्थान के किसानों के लिए अरंडी कैश क्रॉप बनती जा रही है। लेकिन किसानों को थोड़ा जागरूक होने की जरूरत है। क्योंकि, यह फसल सूखा प्रतिरोधी क्षमता अपने अंदर रखती है। लेकिन, बेहतर उत्पादन के लिए पौधों के जड़ क्षेत्र में नमी बनाए रखना जरूरी है। उन्होंने बताया कि जो किसान पाइपलाइन से सिंचाई करते हैं, उनके लिए वाष्पोत्सर्जन दर बढ़ जाती है। साथ ही, पानी भी ज्यादा लगता है। वहीं, यदि तापमान ज्यादा हो तो पाइप के अंदर जमा पानी गर्म हो जाता है। जब फसल को सिंचाई दी जाती है तो गर्म पानी पौधों के जड़ क्षेत्र में पहुंचता है। परिणामस्वरूप पौधा तनाव में आ जाता है और पौधें की पत्तियां झुलसी हुई नजर आती है। कई बार पत्तियां मुरझा जाती हैं। इससे पौधे को पूरा पोषण नहीं मिल पाता है। क्योंकि, पत्तियां मुरझाने के कारण प्रकाश संशषण की प्रक्रिया प्रभावित होती है और पौधें को पर्याप्त भोजन उपलब्ध नहीं हो पाता है। इससे पौधें की विकास दर धीमी पड़ जाती है। उन्होने बताया कि स्प्रिंकलर सिंचाई भी इस फसल में ज्यादा कारगर नहीं है। क्योंकि, जब पानी तेज प्रवाह के साथ पौधें पर गिरता है तो फूल झड़ जाते है। इससे उत्पादन में नुकसान उठाना पड़ता है। गौरतलब है कि वर्ष 2050 तक आबादी बढ़कर 100 मिलियन होने का अनुमान है। ऐसे में कृषि क्षेत्र पर भी दबाव बढऩा तय है। अनुमान के मुताबिक सिंचाई जल का 83 प्रतिशत हिस्सा घटकर 70 फीसदी हो सकता है। ऐेसे में ज्यादा तापमान और बालू मिट्टी के चलते बाड़मेर, जैसलमेर, जालौर, जोधपुर और सिरोही जिले में किसानों के लिए एक बड़ी चुनौति खड़ी हो सकती है। 

बूंद-बूंद सिंचाई क्यों जरूरी

ड्रिप इरिगेशन पानी के इस्तेमाल का एक अच्छा तरीका है। जो इन मुश्किल हालात में किसानों को राहत देने में कारगर है। यह पानी को सीधे पौध की जड़ तक पहुंचाता है और पानी की भाप बनने और पानी के बहाव को कम करता है। यह सिस्टम खास तौर पर पश्चिमी राजस्थान के सूखे हालात के लिए उपयोगी है। 

बढता है विल्ट का खतरा

वैसे तो अरंडी की फसल को बुवाई के 50-60 दिन तक सिंचाई की जरूरत नहीं होती है। लेकिन, इसके बाद फसल की क्रांतिक अवस्था पर सिंचाई की जरूरत होती है। यदि किसान परम्परागत तौर-तरीके से फसल का उत्पादन लेता है तो खरपतवार के साथ-साथ कीट-रोग की समस्या से भी जूझना पड़ता है। डॉ. जांगिड़ ने बताया कि अनियमित सिंचाई से फसल में विल्ट का खतरा बढ़ जाता है। 

शोध के यह रहे परिणाम

उन्होनेबताया कि ड्रिप सिंचाई पद्धति के अंतर्गत अरण्डी फसल के लिए सामान्यत: तीन दिन के अंतराल पर सिंचाई दी जाती है, जो स्थानीय मौसम की स्थिति और मृदा नमी स्तर पर निर्भर करती है। वैकल्पिक रूप से, सिंचाई 

जल-संचयी पैन वाष्पीकरण अनुपात 0.8 के आधार पर सिंचाई निर्धारण को अधिक प्रभावी पाया गया है।  गौरतलब है कि ड्रिप से सिंचाई के लिए बीज लगाने का तरीका भी किसानों को बदलना होता है। इसमें 120 सेमी. गुना 90 सेमी. के आधार पर पौधें लगाए जाते है। शोध में अरंडी फसल के लिए सामान्यतः 2-4 लीटर प्रति घंटा प्रवाह दर वाले एमिटर उपयुक्त माने गए हैं। फसल की जल आवश्यकता के अनुसार प्रति पौधा एमिटर की संख्या में आवश्यकतानुसार समायोजन किया जा सकता है। 

40 फीसदी तक बढ़ जाती है उपज 

शोध में सामने आया है कि ड्रिप सिंचाई से अरंडी की उपज भी बेहतर होती है। उपज में 20-40 फीसदी तक वृद्धि दर्ज की गई है। इसके अलावा ड्रिप सिंचाई जल को सीधे जड़ क्षेत्र तक पहुँचाकर मृदा में उपयुक्त नमी बनाए रखती है, जिससे जल अपव्यय कम होता है और सिंचाई प्रबंधन सुधरता है। साथ ही, मौसमी जल आवश्यकता लगभग 500 मिमी. से घटकर 350 मिमी. रह जाती है। ड्रिप प्रणाली से वाष्पीकरण और वाष्पोत्सर्जन कम मात्रा में होता है जिससे पौधों तथा पारिस्थितिकी जल उपयोग दक्षता में वृद्धि होती है। ड्रिप सिंचाई के साथ फर्टिगेशन करने से पोषक तत्वों का संतुलित उपयोग होता है, जिससे उर्वरक दक्षता बढ़ती है और साथ ही में उर्वरकों की बचत भी होती है। ड्रिप सिंचाई द्वारा अरंडी की उपज में लगभग 20-40 प्रतिशत तक और कुछ क्षेत्रों में 60 प्रतिशत से अधिक वृद्धि दर्ज की गई है।


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