मक्का उत्पादन 55 से बढ़ाकर 75 एमटी करने का लक्ष्य
(सभी तस्वीरें- हलधर)जयपुर। देश में मक्का उत्पादन को अगले दशक में 55 मिलियन टन से बढ़ाकर 75 मिलियन टन करने का लक्ष्य तय किया गया है। इसके लिए मक्के की उत्पादकता में 1.5 गुना वृद्धि, उन्नत हाइब्रिड बीजों के विकास, बेहतर फसल प्रबंधन और आधुनिक तकनीकों को अपनाने पर जोर दिया गया है। हैदराबाद में आयोजित पहले अंतरराष्ट्रीय मक्का सम्मेलन में देश-विदेश के वैज्ञानिकों, नीति-निर्माताओं और कृषि विशेषज्ञों ने मक्का उत्पादन को अधिक लाभकारी और टिकाऊ बनाने की रणनीतियों पर मंथन किया।
सम्मेलन में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के महानिदेशक डॉ. एम.एल. जाट ने कहा कि भारत में मक्का उत्पादन लगभग 55 मिलियन टन तक पहुंच गया है और पिछले एक दशक में उत्पादकता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। अब अगले दशक में उत्पादन 75 मिलियन टन तक पहुंचाने के लिए अनुसंधान, तकनीकी नवाचार और संसाधनों के बेहतर उपयोग की जरूरत है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कृषि अनुसंधान और विस्तार गतिविधियों का वास्तविक लाभ खेतों में दिखाई देना चाहिए। किसानों की आय, मुनाफे और आजीविका में बढ़ोतरी ही अनुसंधान की सफलता का पैमाना होना चाहिए।
मक्का विस्तार के साथ दलहन-तिलहन का संतुलन जरूरी
डॉ. जाट ने मक्का उत्पादन बढ़ाने के लिए सिस्टम साइंस आधारित दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि खेती में प्रबंधन संबंधी कमियों को दूर कर उत्पादकता के अंतर को कम किया जा सकता है। मक्के की खेती को अलग-अलग मौसम और कृषि-पारिस्थितिक क्षेत्रों में बढ़ावा देने की रणनीति बनाई जानी चाहिए, लेकिन इससे दलहन और तिलहन फसलों के क्षेत्र पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए। उन्होंने सार्वजनिक क्षेत्र में विकसित हाइब्रिड बीजों की उपलब्धता और गुणवत्ता सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया।
329 नई हाइब्रिड किस्मों का विकास
आईसीएआर के उप महानिदेशक डॉ. डी.के. यादव ने मक्के को खाद्य, पोषण और ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण फसल बताया। उन्होंने कहा कि पिछले पांच वर्षों में मक्का अनुसंधान के तहत 329 हाइब्रिड किस्में विकसित की गई हैं। अब अधिक उत्पादन देने वाली, बेहतर पोषण गुणवत्ता वाली तथा जैविक और अजैविक तनावों को सहन करने में सक्षम किस्मों के विकास पर ध्यान देना होगा। उन्होंने मशीनीकरण, इनपुट के दक्ष उपयोग और सार्वजनिक क्षेत्र में हाइब्रिड बीज उत्पादन मजबूत करने की जरूरत बताई। मक्के को इथेनॉल उत्पादन के कच्चे माल के रूप में उपयोगी बनाने के लिए शोध संस्थानों, विश्वविद्यालयों और उद्योगों के बीच सहयोग बढ़ाने की बात भी कही।
किसानों की जरूरत के अनुसार हो बीज अनुसंधान
प्रख्यात मक्का वैज्ञानिक पद्मश्री डॉ. एस. वसल ने किसानों की जरूरतों के अनुरूप उन्नत किस्में और हाइब्रिड विकसित करने के लिए सरल एवं कम लागत वाली ब्रीडिंग तकनीकों को अपनाने की पैरवी की। वहीं, आईसीएआर के पूर्व महानिदेशक डॉ. आर.एस. परोदा ने अनुसंधान प्राथमिकताओं को कृषि क्षेत्र की बदलती जरूरतों के अनुरूप तय करने की बात कही। उन्होंने जर्मप्लाज्म संरक्षण, आधुनिक ब्रीडिंग तकनीकों, मजबूत वैल्यू चेन और अफ्लाटॉक्सिन प्रबंधन पर जोर दिया, ताकि मक्के की गुणवत्ता और खाद्य एवं पशु आहार के रूप में सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
सम्मेलन का विषय 'बदलती दुनिया में भोजन, पशु आहार, चारा, ईंधन और स्थिरता के लिए मक्का क्रांति' रखा गया है। इसमें मक्के की बढ़ती भूमिका, पोषण गुणवत्ता, संसाधन दक्षता, मशीनीकरण और मजबूत बीज प्रणाली पर चर्चा हो रही है। सम्मेलन में वैज्ञानिक प्रकाशनों का विमोचन करने के साथ मक्का अनुसंधान में उल्लेखनीय योगदान देने वाले वैज्ञानिकों को सम्मानित भी किया गया।