सरकारी लैब में अवैध बायो-पेस्टिसाइड का खेल, लाइसेंस प्रक्रिया पर उठे सवाल
सरकारी लैब में अवैध बायो-पेस्टिसाइड का खेल, लाइसेंस प्रक्रिया पर उठे सवाल
(सभी तस्वीरें- हलधर)पीयूष शर्मा
जयपुर। किसानों को ठगी से बचाने के लिए कृषि विभाग प्रदेशभर में अमानक उर्वरक, कीटनाशी, खरपतवारनाशी की रोकथाम के लिए छापेमार कार्यवाही को अंजाम दें रहा है। लेकिन, बात जब सरकारी लैब की हो तो आंखे मूंद लेना कोई नहीं बात नहीं। गौरतलब है कि प्रदेश के आईपीएम लैबों में अवैध रूप से जैव कीटनाशी तैयार किए जा रहा है और किसानों तक पहुंचाया जा रहा है। कीटनाशी का उत्पादन भी एक-दो किलो नहीं, टन में हो रहा है। लेकिन, लैब के पास ना तो लाइसेंस है और ना ही बायोपेस्टीसाइड़ तैयार करने में निर्धारित प्रॉटोकॉल का पालन हो रहा है। यानी सरकारी लैब में अवैध बायोपेस्टीसाइड़ तैयार हो रहा है। बता दें कि इन लैब में न्यूक्लीअर पाली हेड्रोसिस वायरस (एन.पी.वी), मेटाराहाइजियम, ब्यूवेरिया बासियाना जैसे बायोपेस्टीसाइड़ का निर्माण किया जा रहा है। जबकि, आईपीएम लैब के पास ट्राइकोडर्मा उत्पादन और बिक्री का ही लाइसेंस है। ऐसे मेें कृषि विभाग पर सवाल उठना लाजिमी है। प्रदेश के जैविक और प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहन देने के लिए पिछले दो साल से सरकार जैव उर्वरक और जैव कीटनाशी उत्पादन को बढ़ावा दे रही है। पिछले साल प्रदेश की सभी 10 आईपीएम लैब को 100 टन जैव उर्वरक और कीटनाशी तैयार करने का लक्ष्य आवंटित किया गया था। इस साल लक्ष्य को बढ़ाकर 200 टन कर दिया गया। लेकि न, सरकार की इस कवायद का स्याह पहलू यह है कि लैब में तैयार हो रहा जैव कीटनाशी पूरी तरह से अवैध है। क्योंकि, कीटनाशी विनिर्माण और बिक्री के लिए नियम सभी के लिए एक जैसे है। ऐसे में कहा जा सकता है कि कृषि विभाग की अमानक जैव कीटनाशी किसानों तक पहुंचा रहा है।
प्राकृतिक रोकथाम में कारगर
एन.पी.वी: वह सूक्ष्मजीवी केवल न्यूक्लिक एसिड और प्रोटीन के बने होते है, वायरस कहलाते है। इन वायरसों से प्रभावित पत्ती को खाने से सुंडी सर्वप्रथम संक्रमित सुंडी सुस्त हो जाती है, और 4-7 दिन के अन्तराल में मर जाती है।
ब्यूवेरिया बासियाना: इस फफूंदी का प्रयोग लेपिडोप्टेरा वर्ग की सुंडियो जैसे, चने की सुंडी, बालदार सुंडी, वूली एफिड, सफेद मक्खी और स्पाईडर माईट आदि की रोकथाम के लिए किया जाता है।
मेटारीजियम एनीसोपली: यह एक बहुउपयोगी जैविक फफूंदी है, इसका प्रयोग दीमक, ग्रास हॉपर, प्लांट हॉपर, वूली एफिड और बीटल की रोकथाम के लिए करते है।
ट्राईकोडर्मा: ट्राईकोडर्मा का प्रयोग मृदाजनित रोग जैसे, उकठा, जड़ गलन, कॉलर सडऩ आदि में प्रबंधन के लिए विभिन्न प्रकार की दलहनी, तिलहनी, सब्जियों और कपास में प्रयोग किया जाता है।
ना संसाधन और डीडीओ पावर
बजट घोषणा को लक्ष्य तक पहुंचाने के लिए सभी आईपीएम लैब को लक्ष्य तो आंवटित किए है। लेकिन, इन लैबों के हालात काफी दयनीय है। सूत्रों ने बताया कि प्रत्येक जैव कीटनाशी निर्माण के लिए अलग लैब और अलग-अलग प्रॉटोकॉल का पालन करना होगा। उदाहरण के तौर पर महाराणा प्रताप कृषि विश्वविद्यालय, उदयपुर में संचालित लैब को लिया जा सकता है। वहां पर पूरे प्रॉटोकॉल के साथ जैव कीटनाशी तैयार किए जा रहे है। लेकिन, यहां एक ही लैब में जैव उर्वरक और कीटनाशी तैयार हो रहे है। जबकि, लैब के पास आवश्यक संसाधन ही नहीं, प्रशिक्षित कार्मिकों का भी अभाव है। दो-तीन लैब तो ऐसी है, जिनका संचालन एक कृषि अधिकारी के भरोसे हो रहा है। सूत्रों ने बताया कि लैब इंचार्ज के पास डीडीओ पावर भी नहीं है। ऐेसे में हर बात के लिए आयुक्तालय पर निर्भर रहना पड़ता है।
एसओपी का भी अभाव
सूत्रों ने बताया कि प्रदेश की आईपीएम लैब में केन्द्रीय एकीकृत कीट प्रबंधन केन्द्र की एसओपी भी लागू नहीं है। यदि एसओपी लागू हो तो लैब का एक्रीडेशन भी हो और तय प्रॉटोकॉल से गुणवत्तापूर्ण जैव कीटनाशी का उत्पादन भी संभव हो। बता दें कि जैव कीटनाशी तैयार करने के लिए कृ षि आयुक्तालय स्तर पर संयुक्त निदेशक पौध संरक्षण के द्वारा अनुज्ञापत्र जारी किया जाता है। लेकिन, इसके लिए पहले लैब का सीआईपीएमसी-फरीदाबाद से एक्रीडेशन होना जरूरी है।
नुकसान का जिम्मेदार कौन
सूत्रों ने बताया कि तैयार जैव कीटनाशी किसानों को दिया जा रहा है। यदि किसान को इस जैव कीटनाशी के चलते फसली नुकसान होता है, उस स्थिति में जिम्मेदार कौन होगा? हालांकि, जैव कीटनाशी से फसली नुकसान की बात फिलहाल सामने नहीं आई है। लेकिन, गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए दूसरे कीटनाशी के समान ही गुणवत्ता जांच भी जरूरी है।
आईपीएम लैब में तैयार जैव कीटनाशी किसानों को नि:शुल्क उपलब्ध कराया जा रहा है। जैव कीटनाशी से फसल को नुकसान नहीं होता है। यह सही है कि लैब के पास ट्राइकोडर्मा उत्पादन और व्यवायिक बिक्री का ही लाइसेंस है। अगले वित्तीय वर्ष में जैव कीटनाशी के लिए भी अनुज्ञापत्र प्राप्त करने के लिए आवश्यक कदम उठाये जायेंगे।
डॉ. केके मंगल, संयुक्त निदेशक (पौध व्याधि), आईपीएम लैब, जयपुर