पपीता की खेती में इस बात का रखें ध्यान, वरना मेहनत हो जाएगी बर्बाद
(सभी तस्वीरें- हलधर)पपीता की खेती करने वाले किसानों को इस समय बहुत ही सावधानी बरतने चाहिए। इनदिनों पपीते की फसलों में 'एंथ्रेक्नोज' नामक रोग का प्रकोप तेजी से देखा जा रहा है। यह बीमारी न केवल फसल की गुणवत्ता खराब करती है, बल्कि पैदावार को भी भारी नुकसान पहुंचाती है। अगर, समय रहते इस फलनाशी बीमारी का उपचार नहीं किया जाये तो यह किसान की मेहनत और लाखों की आय पर पानी फेर सकती है।
क्या है यह बीमारी और कैसे पहचानें?
यह रोग 'कोलिटोट्राईकम ग्लियोस्पोराडस' नामक कवक के कारण फैलता है। इसकी पहचान करना काफी आसान है।
यदि आप इन लक्षणों पर गौर करें:
शुरुआती लक्षण: फल के ऊपर छोटे-छोटे, जलीय धब्बे दिखाई देने लगते हैं।
रंग में बदलाव: समय के साथ ये धब्बे बड़े हो जाते हैं और इनका रंग पीला या गहरा काला हो जाता है।
गंभीर अवस्था: धब्बे बीच में से धंस जाते हैं और उन पर गुलाबी या नारंगी रंग के पाउडर जैसे कवक के बीजाणु दिखने लगते हैं।
असमय नुकसान: यह बीमारी फल लगने से लेकर उनके पकने तक किसी भी अवस्था में हो सकती है। इसके कारण फल पकने से पहले ही कमजोर होकर नीचे गिर जाते हैं।
रोग फैलने का कारण
हवा में अधिक नमी और मध्यम तापमान इस कवक के फैलने के लिए सबसे अनुकूल होते हैं। अक्सर घने बागों में, जहाँ हवा का संचार कम होता है, यह बीमारी तेजी से फैलती है।
बचाव और प्रभावी रोकथाम के उपाय
विशेषज्ञों के अनुसार, किसान समय रहते प्रबंधन करके अपनी फसल बचा सकते हैं। बगीचे में गिरे हुए संक्रमित फलों और पत्तियों को इकट्ठा करके जला दें या मिट्टी में गहरा दबा दें, ताकि कवक आगे न फैले। साथ ही पौधों के बीच पर्याप्त दूरी रखें ताकि धूप और हवा हर फल तक पहुँच सके।
रोग के लक्षण दिखते ही मैन्कोजेब नामक कवकनाशी की 2 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। जरूरत पड़ने पर 10-15 दिनों के अंतराल पर दोबारा स्प्रे करें। फल तोड़ने के बाद भी यह रोग बढ़ सकता है, इसलिए भंडारण से पहले फलों को अच्छी तरह सुखा लें और चोटिल फलों को अलग रखें।