अमरूद से बनाएं स्वादिष्ट जैली, घर बैठे बढ़ाएं अपनी कमाई
(सभी तस्वीरें- हलधर)स्वाद से भरपूर होने के साथ-साथ अमरूद कई रोगों की औषधि भी है। हार्मोनल असंतुलन और दिल संबंधी बीमारियों में अमरूद का सेवन बेहद लाभकारी होता है। डायबिटीज के रोगी भी इस फल को खाकर स्वास्थ्य-लाभ पा सकते हैं। अमरूद में विटामिन सी, लाइकोपीन और एंटी-ऑक्सीडेंट्स काफी होता है। यह त्वचा के लिए बेहद फायदेमंद औषधि है। इसमें फोलेट की काफी मात्रा पाई जाती है। किसान अमरूद की खेती से अच्छी आय प्राप्त कर सकता है। अमरूद का प्रसंस्करण करके किसान अपनी आय को और बढ़ा सकते हैं।
जैली क्या है
किसी भी गुदेदार फल को साबुत अथवा बारीक टुकड़ों में काटकर पानी के साथ उबाल कर कपड़े से छानने के बाद प्राप्त रस में चीनी, पानी और खटाई की उचित मात्रा के साथ पकाकर इतना गाढ़ा कर लिया जाता है कि उसमें चीनी की मात्रा 65 प्रतिशत से 70 प्रतिशत हो जाए और वह ठण्डा होने पर दही की तरह जम जाए। इस प्रकार से तैयार पदार्थ को जैली कहते हैं।
जैली हेतु फलों का चुनाव
जैली केवल उन्ही फलों की बनाई जाती है जिनमें पैक्टीन की मात्रा अधिक होती है। मुख्यत: अमरूद, करौंदा, सेब, आम, कच्चा आदि फलों से बनाई जाती है।
अमरूद जैली बनाना
ठीक तरह से पके हुए फलों को साफ पानी में धोकर उन्हें गोल-गोल अथवा चोकोर पतले-पतले टुकड़ों में काट लेते हैं। इस प्रकार से तैयार फलों को भगोने में डालकर इतना पानी डालते हैं कि फल पानी में डूब जाएं। फिर, आग पर 25 से 30 मिनट तक उबालते हैं। इसके बाद फल को मलमल के कपड़े से बिना दबाये छान लेते हैं। क्योंकि, दबाने से हल्का गुदा निकल आता है। जिससे जैली पारदर्शक नहीं बनती है।
पेक्टिन के अनुसार मिलाएं चीनी
छानने के बाद प्राप्त रस में पैक्टीन की जांच करने हेतु एक चम्मच रस लेकर ठंडा करते हैं। रस में दो चम्मच स्प्रिट मिला देते हैं। फिर गिलास को प्लेट पर तिरछा करके पैक्टीन को गिराते हैं। पैक्टीन यदि एक टुकड़े में हो तो प्रथम श्रेणी की, दो टुकड़ों में हो तो द्वितीय श्रेणी की और दो टुकड़ों से अधिक टुकड़ों में हो तो तृतीय श्रेणी की होती है। छने हुए रस को अथवा पैक्टीन को नाप लेते हैं। एक किलोग्राम रस में प्रथम श्रेणी की पैक्टीन हो तो 750 ग्राम से 1 किलोग्राम तक, द्वितीय श्रेणी की पैक्टीन हो तो आधा किलो से 750 ग्राम तक, तृतीय श्रेणी की पैक्टीन हो तो 300 ग्राम से 500 ग्राम तक चीनी मिलाते हैं। चीनी मिलाकर पकने के लिए रख देते हैं। उबाल आने और चीनी घुल जाने पर उसको कपड़े से छान लेते हैं। छानने के बाद फिर पकने के लिए रख देते हैं। बिना हिलाए पकने के लिए रख देते हैं। पकते-पकते जब जैली काफी गाढ़ी हो जाए तो उसमें एक किलोग्राम चीनी पर 6 से 10 ग्राम के हिसाब से साइट्रिक एसिड मिला देते हैं।
तैयार जैली की जांच
जब पकती हुई जैली की सतह चमकदार हो जाए अथवा फिर पकती हुई जैली में पूरे भगोने में बड़े-बड़े बुलबुले उठने लगें तो जैली को तैयार समझते हैं।
लैडल फ्लैक अथवा शीट टेस्ट
यह सबसे उत्तम तरीका है। इसके लिए पकती हुई जैली में एक लकड़ी की चम्मच डुबोकर बाहर निकालकर हवा में घुमा-घुमा कर ठंडा करते हैं। पहले-पहिले जैली बूंद-बूंद गिरती है। लेकिन, बाद में एक तिकोनी चादर के रूप में चम्मच से लटक जाती है। अगर यह चादर चम्मच में चिपकी रहे तो जैली तैयार समझते हैं।
जैली का भंडारण
जैली तैयार होने पर भगोने को तुरन्त आग से उतार लेते हैं और भगोने को तिरछा करके रख देते हैं। कुछ देर के लिए जैली को छोड़ देते हैं। जिससे जैली का झाग जम जाता है। झाग को चम्मच की सहायता से निकाल देते हैं। गर्म-गर्म जैली को साफ और सुकाई हुई चौड़े मुख की शीशियों में भरकर ठंडा होने पर ही उनका ढक्क न बंद कर देते हैं।