भिंडी में कीट- रोग प्रबंधन
भिंडी के रोगों मे पीत शिरा मोजैक वायरस, चूर्णिल आसिता और कीटों में मोयला, हरा तेला, सफेद मक्खी, प्ररोह- फल छेदक कीट, रेड स्पाइडर माइट मुख्य है। यह कीट फसल के उत्पादन के साथ किसान को भी आर्थिक नुकसान पहुंचाते है। ऐसे में कीट-रोग का समय रहते नियंत्रण करके किसान अपनी आमदनी को बढ़ा सकते है।
कीट
- प्ररोह-फल छेदक -: प्रबंधन : क्षतिग्रस्त पौधे के तने और फल को एकत्रित करके नष्ट कर दें। फल छेदक की निगरानी के लिए 5 फेरोमोन ट्रैप प्रति हैक्टेयर लगायें। साथ ही, ट्राइकोम्रामा काइलोनिस एक लाख प्रति हैक्टेयर की दर से 2-3 बार उपयोग करें अथवा साइपरमेथ्रिन 4 मिली प्रति 10 लीटर पानी, क्लोरपायरीफॉस 20 प्रतिशत ईसी अथवा प्रोफेनफॉस 50 प्रतिशत ईसी 5 मिली प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करें।
- फुदका अथवा तेला -: नीम की खली 250 किग्रा प्रति हैक्टेयर दर से अंकुरण के तुरंत बाद और 30 दिन बाद मिट्टी में मिला दें। चाहिए। बुवाई के समय कार्बोफ्यूरॉन 3जी 1 किग्रा प्रति हैक्टेयर की दर से मिट्टी में मिलाएं।
- सफेद मक्खी -: नीम बीज के पावडर 4 प्रतिशत अथवा 1 प्रतिशत नीम तेल का छिड़काव करें। कीट का प्रकोप अधिक लगने पर डायमिथोएट 30 प्रतिशत ईसी 1 मिली प्रति लीटर पानी अथवा इमिडाक्लोप्रिड 17.8 प्रतिशत एसएल अथवा एसिटामिप्रिड 20 प्रतिशत एसपी 5 मिली प्रति 15 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।
- रेड स्पाइडर माइट -: इसकी रोकथाम हेतु डाइकोफॉल 5 ईसी 2 मिली अथवा घुलनशील गंधक 2.5 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें। छिड़काव को आवश्यकतानुसार दोहराएं।
- जड़ ग्रन्थि सूत्रकृमि -: ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई 2 से 3 बार करनी चाहिए। स्यूडोमोनास फ्लोरीसेन्स 10 ग्रा प्रति किग्रा बीज की दर से बीजोपचार करना चाहिए। पौधो के प्रारम्भिक वृद्धि अवस्था के समय सिंचाई से पहले नीमागॉन 30 लीटर प्रति हैक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए।
प्रमुख रोग
- पीत शिरा -: डायमिथोएट 30 प्रतिशत ईसी 5 मिली प्रति लीटर पानी अथवा इमिडाक्लोप्रिड 17.8 प्रतिशत एसएल अथवा एसिटामिप्रिड 20 प्रतिशत एसपी 5 मिली प्रति 15 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें
- चूर्णिल आसिता -: रोग नियंत्रण हेतु घुलनशील गंधक 5 ग्राम अथवा हैक्साकोनोजोल 5 प्रतिशत ईसी 1.5 मिली प्रति लीटर पानी में घोलकर 2-3 बार 12-15 दिनों के अंतराल पर छिड़काव करें।
- आर्द्र गलन -: ट्राइकोडर्मा विरीडी 3 ग्राम प्रति किग्रा बीज दर से बीजोपचार करें। डाइथेन एम- 45 को 0.2 प्रतिशत अथवा बाविस्टिन 1 प्रतिशत की दर से मिट्टी में मिलाने से इस रोग में कमी आती है।
- फ्यूसेरियम विल्ट -: रोग अधिक दिखने पर बाविस्टिन 1 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर 5-6 दिन के अंतराल में 3 बार ड्रेंचिंग करें।