3 बोरी तक यूरिया बचाएगा ये हरा पौधा! मानसून में जरूर करें ढैंचा की बुवाई
3 बोरी तक यूरिया बचाएगा ये हरा पौधा! मानसून में जरूर करें ढैंचा की बुवाई
(सभी तस्वीरें- हलधर)अगर आप हर साल बढ़ती यूरिया की कीमतों और कमजोर होती मिट्टी से परेशान हैं, तो इस मानसून ढैंचा (सेसबेनिया) की खेती आपके लिए फायदे का सौदा साबित हो सकती है। यह सिर्फ एक फसल नहीं, बल्कि खेत की प्राकृतिक खाद है, जो बिना किसी रासायनिक खर्च के मिट्टी को ताकत देती है।
क्यों चर्चा में है ढैंचा?
कृषि विभाग किसानों को हरी खाद के रूप में ढैंचा अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह हवा से नाइट्रोजन लेकर मिट्टी में जमा करता है, जिससे फसलों को प्राकृतिक पोषण मिलता है और यूरिया की जरूरत कम हो जाती है।
एक नजर में ढैंचा के बड़े फायदे
विशेषज्ञों के मुताबिक, ढैंचा को खेत में मिलाने से उतनी नाइट्रोजन मिलती है जितनी प्राप्त करने के लिए सामान्यतः 90 से 130 किलो यूरिया डालना पड़ता है। यानी सीधे तौर पर उर्वरक खर्च में बड़ी बचत।
कब और कैसे करें बुवाई?
सही समय
मानसून की शुरुआत सबसे उपयुक्त समय माना जाता है।
बीज दर
25 से 30 किलो बीज प्रति हेक्टेयर।
कब मिलाएं खेत में?
35 से 40 दिन बाद, जब पौधे 1 से 1.5 मीटर ऊंचे हो जाएं और फूल आने की शुरुआती अवस्था में हों।
कैसे करें?
रोटावेटर, डिस्क हैरो या मिट्टी पलटने वाले हल से पौधों को मिट्टी में मिला दें।
15 से 20 दिनों में ढैंचा पूरी तरह सड़कर खेत को प्राकृतिक खाद में बदल देता है।
धान, गेहूं और सोयाबीन किसानों के लिए खास
कृषि विभाग के अनुसार धान-गेहूं, धान-चना, धान-सब्जी और सोयाबीन आधारित फसल चक्र में ढैंचा को शामिल करने से मिट्टी की उर्वरता लंबे समय तक बनी रहती है और अगली फसल को बेहतर पोषण मिलता है।
मिट्टी के लिए ‘नेचुरल हेल्थ बूस्टर’
लगातार रासायनिक खादों के उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित होती है। ढैंचा इसके विपरीत मिट्टी में लाभकारी जीवाणुओं की संख्या बढ़ाता है और खेत को प्राकृतिक रूप से उपजाऊ बनाता है।
किसानों के लिए खुशखबरी
ढैंचा बीज पर 50% तक अनुदान
कृषि विभाग किसानों को ढैंचा बीज खरीदने पर कुल लागत का 50 प्रतिशत अनुदान दे रहा है, जिससे इसकी खेती और भी किफायती हो जाती है।
एक्सपर्ट सलाह
कृषि विशेषज्ञ किसानों को सलाह दे रहे हैं कि मानसून शुरू होते ही ढैंचा बोएं, 35-40 दिन बाद इसे मिट्टी में मिला दें और फिर मुख्य फसल की बुवाई करें। इससे कम लागत में बेहतर उत्पादन और स्वस्थ मिट्टी दोनों का लाभ मिलेगा।