जलसंरक्षण से बाढ़-सूखा नियंत्रण: गांवों के प्रयास बने समाधान

नई दिल्ली 17-Dec-2025 05:25 PM

जलसंरक्षण से बाढ़-सूखा नियंत्रण: गांवों के प्रयास बने समाधान

(सभी तस्वीरें- हलधर)

किसी भी क्षेत्र में बाढ़ और सूखासंकट के पीछे अनेक कारक होते है। वर्षा बहुत होगी अथवा कम, अचानक बहुत तेजी से बरसेगी अथवा ऐन मौके पर रूठ जाएगी। इस पर लोगों का नियंत्रण नहीं है। पर इतना जरूर है कि वह यदि जल और मिट्टी संरक्षण के सतत प्रयास करते रहें तो यह दोनों ही संकट और उपजी क्षति को बहुत कम अवश्य किया जा सकता है। यदि एक क्षेत्र के सैकडों गांव अपने प्राकृतिक वर्षा जल के बहाव के क्षेत्रों को गंदगी और अवरोधों से मुक्त रखते हैं। इनमें गड्ढे कर इनमें अधिक वर्षा के जल को रोक लेते हैं अथवा चेक डैम आदि निर्माण करते हैं, अधिक वृक्ष, मेडबंदी से मिट्टी और पानी को रोकते हैं। तालाबों जैसे जलस्रोतों की नियमित सफाई कर इनकी वर्षा के जल ग्रहण करने की क्षमता को बनाए रखते हैं अथवा बढाते हैं तो इस क्षेत्र में अधिक वर्षा होने पर अधिकांश पानी भली-भांति समा जाएगा। इससे बाढ उत्पन्न करने की समस्या कम होगी। दूसरी ओर बाद के महीनों में जल संकट भी कम होगा। क्योंकि, विभिन्न स्रोतों से अधिक जल एकत्र हो चुका होगा।

इस कारण जलस्तर भी ठीक बना रहेगा। हैंडपंप और कुएं आदि में जल उपलब्ध रहेगा। इस तरह जल स्रोतों और छोटी-बडी नदियों की रक्षा के अनुकूल भी स्थितियां उत्पन्न होंगी। वहीं दूसरी ओर इन सभी कार्यों की उपेक्षा से मामूली वर्षा तेजी से बहुत सी मिट्टी को भी बहा ले जाएगी और बाढ का संकट उत्पन्न करेगी। दूसरी ओर चूंकि विभिन्न स्रोतों और भूजल के रूप में बहुत कम जल संरक्षित हुआ है। अत: मानसून के बाद के महीनों में जलसंकट उपस्थित हो जाएगा। सूख रहे तालाबों पर अतिक्रमण भी होने लगेगा। छोटी नदियां भी संकटग्रस्त हो जाएंगी। अत: स्पष्ट है कि वर्षा की मात्रा, बांध, तटबंध आदि चर्चित कारकों से अलग आपदाओं से रक्षा में एक बडी भूमिका आम लोगों, विशेषकर गांववासियों के जलसंरक्षण से जुडे प्रयासों की है। जहां यह काम निरंतरता, निष्ठा और सूझबूझ से होंगेे। वहां आपदाओं का प्रकोप भी कम हो सकेगा। राजस्थान के करौली जिले के मकनपुर स्वामी गांव में जलसंकट से त्रस्त गांववासियों के प्रयासों के बाद जब जलस्रोतों की सफाई से प्राप्त उपजाऊ मिट्टी किसानों को उनके खेतों के लिए प्राप्त हुई तो पथरीली, खनन प्रभावित भूमि पर भी फसल लहलहाने लगी।

इसी तरह  मध्यप्रदेश के जल संकटग्रस्त नदना गांव में ढलानदार भूमि में वर्षा का जल और भी तेजी से बह जाता था और मिट्टी भी अधिक काटता था। खेती की उत्पादकता कम हो गई थी। प्रवासी मजदूरी पर निर्भरता बढ रही थी। यहां भी जलसंरक्षण के प्रयास आरंभ हुए। जल प्रवाह के नाले में लगभग 80 स्थानों पर गड्ढे बनाए गए। खेततालाब, गेवियन किस्म के चेक डैक बनाए गए। इससे भूजल स्तर में बहुत सुधार हुआ, लोगों को कुओं और हैंडपंप में पर्याप्त पानी मिलने लगा। पशुपक्षियों को जल-स्रोतों में वर्ष भर पर्याप्त पानी मिलने लगा। घास चारा भी अधिक उपलब्ध होने लगा। कृषि उत्पादकता भी बढी । भूमि कटाव रुका और मिट्टी की गुणवत्ता बेहतर हुई है।

इन विभिन्न गांवों में जल स्थिति को इन संरक्षण उपायों से सुधारा गया है तो जहां लोगों को राहत मिली, वहीं आपदाओं के संकट भी कम हुए हैं। जलसंरक्षण को आगे बढाने के कार्य को सृजन और इसके सहयोगियों ने जलधरोहर अथवा वाटर हैरीटेज की रक्षा के रूप में भी देखा है। जिस तरह सांस्कृतिक और ऐतिहासिक स्तर पर प्राय: धरोहर की रक्षा की चर्चा होती है, वैसे ही जलधरोहर की रक्षा की सोच को आगे बढाया गया है। जनभावनाएं विशेषकर नदियों की रक्षा से बहुत जुडी हैं। इसके बावजूद अनेक प्रतिकूल स्थितियों के कारण अनेक छोटी और सहायक नदियां संकटग्रस्त होती जा रही हैं। इनमें जल बहुत कम होने पर आसपास अतिक्रमण हो जाते हैं। बाद में पानी अधिक बरसने पर पानी की धारा अपना प्राकृतिक मार्ग ढूंढती है तो बाढ आ जाती है। इस तरह जलसंरक्षण उपाय बाढ और सूखे दोनों का संकट कम करने में बहुत उपयोगी भूमिका निभाते हैं। यदि इन्हें जल.धरोहर की रक्षा के रूप में अधिक प्रतिष्ठित किया जाए तो और भी बढती संख्या में और अधिक उत्साह से लोग इन प्रयासों से जुड सकते हैं।


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