गोबर की खाद से खेतों में बढ़ेगी नमी, सिंचाई का खर्च घटेगा 

नई दिल्ली 29-Oct-2026 02:21 PM

गोबर की खाद से खेतों में बढ़ेगी नमी, सिंचाई का खर्च घटेगा 

(सभी तस्वीरें- हलधर)

वर्तमान में किसान अंधाधुंध तरीके से रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का प्रयोग कर रहे हैं। इससे किसान पर आर्थिक भार पड़ रहा है। साथ ही, सम्पूर्ण मानव के खाद्य पदार्थों और भूसे में (अनाज, दलहन, तिलहन, तेल, घी इत्यादि) आवश्यकता से अधिक रसायन तत्व सम्मिलित हो रहे हैं। परिणाम यह हो रहा है कि मानव अनेकानेक नई बीमारियों से ग्रसित हो रहा है। ऐसी स्थिति में पशुओं से प्राप्त दूध के अतिरिक्त उत्पाद जैसे गोबर, पशु-मूत्र की उपयोगिता अत्यधिक बढ़ती जा रही है। हरी खाद, नेडेप कम्पोस्ट इत्यादि का भी महत्व बढ़ता जा रहा है।

गोबर का सदुपयोग

पशुओं की संख्या के आधार पर गोबर इकट्ठा करने के स्थान (रोड़ी) पर 4-5 फीट गहरा, लम्बा, चौड़ा गड्ढा खोदे। इसमें ताजा गोबर तब तक भरें जब तक जमीन स्तर तक नहीं आ जाए। अंत में हल्के से पानी से उस पर एक लेप तैयार करें। ताकि, गड्ढा वायुरोधक हो जाये। यदि 2-3 दिनों में परत पर दरार पड़ती है तो उसे पुनः लेप कर बन्द कर दें। बन्द होने के करीब 3-4 माह में गोबर पूर्णतः सड़ जायेगा।

लाभ

इस तरह तैयार खाद में खुली रोड़ी के खाद की अपेक्षा पोषक तत्व का प्रतिशत बढ़ जायेगा। खरपतवार के बीज नष्ट हो जायेंगे। खाद को दीमक नहीं खायेगी। फसल में इस खाद का प्रयोग करेंगे उसमें कम सिंचाई की आवश्यकता होगी।

बायोगैस प्लांट

प्रतिदिन के गोबर को गोबरगैस प्लांट में डाला जाता है। जिससे खान पकाने की गैस (मीथेन) के साथ उच्च गुणवत्ता वाली स्लरी मिलती है। घर पर लाइट के लैम्प भी जल सकते हैं। खाद में खरपतवारों के बीज समाप्त हो जाते हैं। स्लरी को कभी दीमक नहीं खाती है। जबकि, रोड़ी वाले गोबर को दीमक खाती है और बाद में फसल को भी नुकसान पहुंचाती है। स्लरी डालने वाले खेत में कम सिंचाई की आवश्यकता होती है। घर और गांव का पर्यावरण शुद्ध रहता है।

वर्मी कम्पोस्ट

रोड़ी वाले गोबर की खाद से 2-3 गुणा अधिक मात्रा में पोषक तत्व पाये जाते हैं। सम्पूर्ण खाद वर्मी कम्पोस्ट में परिवर्तित हो जाती हैं। जबकि, रोड़ी वाले खाद में लगभग 60-65 प्रतिशत गोबर की खाद बन पाती है। खरपतवार के सभी बीज नष्ट हो जाते हैं। वर्मी कम्पोस्ट वाले खाद में नमी बनी रहती है। वर्मी कम्पोस्ट को कभी दीमक नहीं खाती है।

जैविक कीटनाशक और पोषक तत्व

पशु मूत्र-20 लीटर, ताजा गोबर-2 किग्रा., नीम की पत्ती-2 किग्रा., निम्बोली-250 ग्राम (कूटी हुई), आक के पत्ते-500 ग्राम, काले आक (नसरगंडी) के पत्ते 500 ग्राम, झरमेरी के पत्ते 500 ग्राम, मिट्टी 500 ग्राम, धतूरा के हरे पत्ते 250 ग्राम, लहसुन 250 ग्राम, गुड़ 250 ग्राम, तम्बाकू 50 ग्राम, लाल मिर्च 20 ग्राम, खट्टी छाछ 2 लीटर।

विधि: उक्त सभी सामानों को प्लास्टिक के ड्रम में 15-20 दिन तक सड़ायें और रोज सुबह-शाम डंडे से हिलाते रहें। 15-20 दिन बाद कपड़े से छानकर प्लास्टिक के पात्र में भर लें। उपयोग करते समय एक लीटर घोल में 7-8 लीटर पानी मिलाकर छिड़के। फसल बुवाई के 30-35 दिन, 45-50 दिन और 60-65 दिन की अवस्था पर तीन छिड़काव 7-8 गुना पानी मिलाकर करें। सब्जी और फलदार पौधों में 30 दिन की अवस्था के बाद प्रत्येक 15 दिन के अन्तराल पर छिड़काव करें। प्रति बीघा 90-100 लीटर पानी (6 टंकी) के घोल का छिड़काव सायंकाल 4 बजे बाद करें। इससे फसल को पोषक तत्व मिलने के साथ-साथ पौधों को कीट और बीमारियों से बचाया जा सकता है। इसके छिड़काव से उत्पादित पदार्थ भी जैविक होता है। जो स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव नहीं डालता है।


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