प्रो-ट्रे नर्सरी से जायद सब्जियों की अगेती खेती का पूरा तरीका

नई दिल्ली 26-Dec-2025 03:16 PM

प्रो-ट्रे नर्सरी से जायद सब्जियों की अगेती खेती का पूरा तरीका

(सभी तस्वीरें- हलधर)

कद्दूवर्गीय सब्जियों की खेती गर्म मौसम में की जाती है। इस वर्ग में मुख्य रूप से लौकी, तुरई, करेला, खरबूजा, तरबूज, ककड़ी, टिंडा आदि शामिल है। साथ ही, मिर्च, टमाटर और बैंगन भी इसी मौसम में उगाई जाने वाली सब्जियां है। इन सब्जियों की खेती मैदानी क्षेत्रों, गर्मी के मौसम में फ रवरी मार्च से लेकर जून तक की जाती है। इन सब्जियों की अगेती खेती किसानों को ज्यादा मुनाफा देती है। अगेती फसल उत्पादन के लिए बुवाई से पूर्व किसानों को पौध तैयार करनी होती है। इसके लिए प्रो-टे्र का उपयोग लिया जाता है। प्रो-ट्रे में तैयार की कई सब्जी पौध की गुणवत्ता काफी अच्छी रहती है। साथ ही, मृदा जनित कीट-रोग का डर नही रहता है। इस कारण पौध मृत्युदर काफी कम होती है। 

प्रो ट्रे नर्सरी तकनीकी

प्रो ट्रे प्लास्टिक की बनी हुई एक ट्रे होती है, जिसमें सांचेनुमा छोटे-छोटे कक्ष होते है। इन कक्षों में बीज डालकर ट्रे को नियंत्रित वातावरण में रखकर पौध तैयार की जाती है। टमाटर, बैगन और सभी कद्दूवर्गीय सब्जियों के लिए 18-20 घन सेंटीमीटर आकार के खांचे वाली प्रो ट्रे का प्रयोग किया जाता है। प्रो ट्रे में तैयार पौध कई मायनो में खेत में तैयार पौध से बेहतर होती हैं। नर्सरी से संरक्षित वातावरण में आधुनिक तरीके से रोगरहित और उच्च गुणवत्ता वाली पौध तैयार की जा सकती हैं। इसके अलावा प्रो ट्रे में बीज का जमाव और अंकुरण अच्छा होता है। वहीं पर्याप्त स्थान मिलने के कारण विकास भी बेहतर होता हैं। मौसम के अनुरूप पौधों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर रख सकते हैं। प्रो ट्रे में लगी पौध को एक स्थान से दूसरे स्थान पर आसानी से लाया और ले जाया सकता है।

प्रो ट्रे , माध्यम तैयार करना 

प्रो ट्रे में मिट्टी रहित माध्यम भरा जाता है। यह माध्यम कोकोपिट, परलाइट और वर्मीकुलाइट का मिश्रण होता है। इस माध्यम को तैयार करने के लिए साफ  जगह अथवा पक्के फर्श पर पॉलिथीन बिछाकर तीन भाग कोकोपिट, एक भाग परलाइट और एक भाग वर्मीकुलाइट मिलाकर इस मिश्रण पर पानी छिड़कना चाहिए। पानी डालते समय ध्यान रखें की मिश्रण न तो सूखा रहे ना ही अधिक गीला रहे । ऐसे मिश्रण को साफ  और उपचारित प्रो ट्रे में भर दिया जाता है। इस प्रकार भरी हुई प्रो ट्रे तैयार हो जाती है।

कोकोपीट:- यह मुख्यत: नारियल फ ल के रेशों से बनाया जाता है। क्योंकि, कोकोपीट में पौधों की जड़ें आसानी से वृद्धि करती हैं। कोकोपीट की पानी को रोकने की क्षमता भी बहुत अच्छी होती है। 

परलाइट:- इसकी उत्पत्ति वोल्केनिक चट्टानों से निकले पदार्थ से होती हैै। इसका रंग लगभग सफेद होता है और वजन में यह बहुत ही हल्का होता है, परलाईट में भी पौधों की जड़ वृद्धि अच्छी होती है। जड़ों को आसानी से ऑक्सीजन उपलब्ध होती है।

वर्मीकुलाईट:- यह गंधमुक्त, अविषैला और स्टेराइल प्रवृति का होता है और जल्दी खराब भी नहीं होता है। इसकी पानी को रोकने की क्षमता बहुत अधिक होती है। पौध की जड़ों के लिए हवा भी आसानी से उपलब्ध हो जाती है। वर्मीकुलाईट में कुछ मिनरल्स भी उपलब्ध होते हैं जो पौध वृद्धि के लिए अति आवश्यक हैं। वर्मीकुलाईट का प्रयोग करने से पौध में फ फूं द और सडन की समस्या नहीं आती है।

प्रो ट्रे में बुवाई

माध्यम द्वारा भरी हुई प्रो ट्रे के प्रत्येक खांचे में अंगुली से हल्के गड्डे बनाकर प्रत्येक गड्डे में उन्नत किस्म के उपचारित बीजों की बुवाई करते है । इसके बाद प्रो ट्रे पर एक पतली परत के रूप में मिट्टी रहित माध्यम डाला जाता है। जिसके कि बीज खुले नहीं रहे। तत्पश्चात प्रो ट्रे को समतल स्थान पर अथवा स्टैंड पर रखकर झारे की सहायता से हल्का पानी दिया जाता है।

प्रो ट्रे का रखरखाव

सर्दी के मौसम में बीज अंकुरण के लिए बहुत ध्यान रखना आवश्यक होता है। क्योंकि, तापमान बहुत कम होता है । प्रो ट्रे में आवश्यकतानुसार पानी देना चाहिए। प्रो ट्रे को कीटरोधी नेट से बने कक्ष में रखना चाहिए। जिससे पौध को कीट और रोगमुक्त रखा जा सके । कक्ष को पॉलिथीन से ढककर तापमान को कम किया जा सकता है। इस प्रकार पौध अलग-अलग सब्जियों के हिसाब से 25 से 45 दिनों में तैयार हो जाती है। पौध निकालते समय तने से पकड़कर प्रो ट्रे के कक्ष को अंगुली से ऊपर की तरफ  उठाया जाता है। जिससे माध्यम सहित पौध ट्रे के बाहर आ जाती है। ऐसी पौध में जड़ें सफेद धागे की तरह माध्यम के आसपास लिपटी रहती है। उपयुक्त वातावरण में प्राय: शाम के समय जनवरी के अंतिम सप्ताह अथवा फरवरी के प्रथम सप्ताह में तापमान में बढ़ोतरी हो जाती है। सर्दी का असर कम हो जाता है। तब पौध को प्रो ट्रे से निकाल कर पहले से तैयार खेत में रोप दिया जाता है और पौध रोपण के तुरंत बाद सिंचाई की जाती है।   इस विधि से पौध तैयार कर खेती करने  से सामान्य मौसम से 1 से 1.5 महीने पहले ही इन सब्जियों को उत्पादन होने लगता है।ं इससे किसानों को बाजार भाव भी अच्छा मिलता है। 

प्रो ट्रे नर्सरी तकनीकी के लाभ

  • इस विधि से पौध कम समय में तैयार हो जाती है।
  • पौध बनाने के लिए के लिए उपयोग किए जाने वाले बीज की मात्रा कम उपयोग में ली जाती हैै। क्योंकि, इस तकनीक में बीज विभिन्न वर्गों में बोए जाते हैं और प्रत्येक बीज स्वस्थ पौध देता है।
  • मिट्टी से पैदा होने वाली बीमारियों और कीटों से पौध को संरक्षित किया जा सकता है।
  • जब बैड पर पौध तैयार होती है तो 10-15 प्रतिशत पौध की जड़ें रोपण के समय क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। लेकिन, इस तकनीक में पौध मरने की कोई संभावना नहीं होती है।
  • इस तकनीक से रोपाई के बाद पौध बहुत कम समय में खेत में स्थापित हो जाती है।
  • संरक्षित संरचनाओं का उपयोग करके इस तकनीक के साथ किसी भी समय किसी भी सब्जी की फसल को तैयार किया जा सकता है।
  • इस तरह, तैयार पौध को पैकिंग करने के बाद लंबी दूरी तक पहुंचाया जा सकता है।
  • इस तकनीक में कम उर्वरक और सिंचाई की आवश्यकता होती है।
  • इस विधि का पालन करके सभी पौधे समान दर पर बढ़ते हैं ताकि खेत में रोपित करने के बाद भी वृद्धि दर बराबर हो।
  • इस विधि से महंगी संकर किस्मों का उपयोग कुशलता से किया जा सकता है।