प्राकृतिक खेती, कृषि नवाचार और आत्मनिर्भरता से बदलेगी खेती की तस्वीर
(सभी तस्वीरें- हलधर)उदयपुर। कृषि का भविष्य प्रकृति के संरक्षण, भूमि की उर्वरता और वैज्ञानिक नवाचार पर निर्भर है। पंचगव्य आधारित प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के साथ मिट्टी की सेहत बचाना टिकाऊ कृषि का आधार बनना चाहिए। कृषि विश्वविद्यालयों की जिम्मेदारी केवल डिग्रियां देना नहीं, बल्कि किसान परिवारों से जुड़े ऐसे युवा तैयार करना है, जो खेती में नवाचार और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा दे सकें। यह बात भारतीय जनसंचार संस्थान, जम्मू के क्षेत्रीय निदेशक डॉ. दिलीप कुमार ने महाराणा प्रताप कृषि विश्वविद्यालय , उदयपुर के 27वें स्थापना दिवस समारोह में कही।
राजस्थान कृषि महाविद्यालय के महाराणा प्रताप सभागार में आयोजित समारोह में कुलगुरु डॉ. प्रताप सिंह ने विश्वविद्यालय की भावी प्राथमिकताएं गिनाते हुए किसानों के हित, युवाओं के नवाचार और संस्थान की आर्थिक आत्मनिर्भरता को सर्वोच्च प्राथमिकता बताया। उन्होंने विश्वविद्यालय की आय में इस वर्ष 25 प्रतिशत वृद्धि का लक्ष्य निर्धारित करने की जानकारी दी। साथ ही कहा कि स्थापना दिवस केवल उपलब्धियां गिनाने का अवसर नहीं, बल्कि भविष्य के लिए नए लक्ष्य तय करने और उन्हें हासिल करने का संकल्प लेने का दिन है।
प्राकृतिक खेती से मिट्टी की सेहत बचाने की जरूरत
मुख्य अतिथि डॉ. दिलीप कुमार ने कहा कि भारत कृषि उत्पादन में आत्मनिर्भरता की ओर तेजी से बढ़ रहा है। इसमें किसानों और कृषि वैज्ञानिकों की अहम भूमिका है। कृषि का सीधा संबंध प्रकृति से होने के कारण शिक्षा और अनुसंधान में पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता देनी होगी। उन्होंने पंचगव्य आधारित प्राकृतिक कृषि को प्रोत्साहित करने, भूमि की उर्वरता बनाए रखने और किसानों तक वैज्ञानिक तकनीक पहुंचाने पर जोर दिया। उन्होंने विश्वविद्यालय में नक्षत्र वाटिका स्थापित करने का सुझाव भी दिया। विद्यार्थियों से बड़े लक्ष्य निर्धारित करने और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ने का आह्वान किया।
2047 के लक्ष्य में विश्वविद्यालयों की अहम भूमिका
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के सहायक महानिदेशक (मानव संसाधन विकास) डॉ. शांति कुमार शर्मा ने कहा कि विकसित भारत-2047 के लक्ष्य को हासिल करने में कृषि विश्वविद्यालयों की महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी। उन्होंने विश्वविद्यालय में राजस्व सृजन, सुशासन, मानव कौशल विकास और ई-गवर्नेंस को मजबूत करने की जरूरत बताई। विद्यार्थियों के स्टार्टअप को प्रोत्साहन देने के साथ शिक्षकों में नवाचार और अनुसंधान गतिविधियों को बढ़ावा देने पर जोर दिया।
मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय के कुलगुरु डॉ. कैलाश डांगा ने आधुनिक तकनीक, उन्नत खेती और पशुपालन को कृषि विकास का आधार बताते हुए विश्वविद्यालयों के बीच समन्वय बढ़ाने की आवश्यकता जताई। उन्होंने कहा कि किसानों की आय बढ़ाने के लिए कृषि शिक्षा, अनुसंधान और नवाचार को एक साथ आगे बढ़ाना होगा।
एआई और ऑटोमेशन को अवसर के रूप में अपनाएं
वर्धमान महावीर खुला विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति एवं राज्यपाल के सलाहकार प्रो. कैलाश सोडाणी ने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑटोमेशन को चुनौती मानने के बजाय भविष्य के अवसरों के रूप में अपनाना चाहिए। कृषि शिक्षा को रोजगारोन्मुखी बनाने और उद्योगों की जरूरत के अनुरूप कौशल विकास पर ध्यान देना होगा। वहीं पूर्व कुलपति प्रो. बीएल चौधरी ने बीटी कपास, मक्का में कीट प्रकोप और विद्यार्थियों की समस्याओं के व्यावहारिक समाधान पर जोर दिया। उन्होंने शिक्षकों की कमी दूर करने और पेंशनर्स की समस्याओं के समाधान की जरूरत भी उठाई।
आय में 25 प्रतिशत वृद्धि का लक्ष्य
कुलगुरु डॉ. प्रताप सिंह ने विश्वविद्यालय की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए IFMS 2.0 के क्रियान्वयन तथा कर्मचारियों की वेतन और पेंशन संबंधी समस्याओं के समाधान की जानकारी दी। उन्होंने विश्वविद्यालय को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए आय के नए स्रोत विकसित करने पर जोर दिया। वैज्ञानिकों से अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देने तथा युवाओं से कृषि आधारित स्टार्टअप और उद्यमिता अपनाने का आह्वान किया।
तीन वैज्ञानिकों और 13 किसानों का सम्मान
समारोह में विश्वविद्यालय के तीन वैज्ञानिकों डॉ. एनएल पंवार, डॉ. विनोद सहारण और डॉ. देवेंद्र जैन को विश्व के शीर्ष 2 प्रतिशत वैज्ञानिकों की सूची में स्थान मिलने पर सम्मानित किया गया। वहीं जैविक खेती, सब्जी एवं फूल उत्पादन, फलोद्यान, देशी गोवंश संवर्धन, एकीकृत कृषि प्रणाली, पौध नर्सरी और महिला सशक्तीकरण के क्षेत्र में उल्लेखनीय काम करने वाले 13 जनजाति प्रगतिशील किसानों को भी सम्मान दिया गया।
सम्मानित किसानों में बांसवाड़ा, प्रतापगढ़, सलूम्बर और उदयपुर के किसान शामिल रहे। इनमें महिला किसानों की उल्लेखनीय भागीदारी रही, जिन्होंने खेती और पशुपालन के जरिए नवाचार एवं आजीविका के नए मॉडल विकसित किए हैं।
हाइड्रोपोनिक तकनीक पर पुस्तक जारी
कार्यक्रम में दक्षिणी राजस्थान की सफल कृषि प्रणालियों, किसानों के फसल विविधीकरण के प्रयासों और समन्वित कृषि प्रणाली आधारित सतत आजीविका मॉडल पर प्रकाशित पुस्तकों एवं पुस्तिकाओं का विमोचन किया गया। इसके अलावा पॉलीहाउस में हाइड्रोपोनिक खेती पर तकनीकी बुलेटिन भी जारी किया गया।
समारोह की शुरुआत महाराणा प्रताप की प्रतिमा पर पुष्पांजलि और दीप प्रज्ज्वलन से हुई। राजस्थान कृषि महाविद्यालय के अधिष्ठाता डॉ. लोकेश गुप्ता ने विश्वविद्यालय का प्रगति प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। इसमें कृषि शिक्षा, अनुसंधान, रेडियो स्टेशन, ड्रोन तकनीक, स्मार्ट विलेज परियोजना के तहत सात गांवों को गोद लेने और किसानों तक नई तकनीकों के हस्तांतरण की उपलब्धियां बताई गईं। समारोह में विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति, अधिकारी, वैज्ञानिक, शिक्षक, कर्मचारी, विद्यार्थी और गणमान्य नागरिक मौजूद रहे।