झुलस गई जायद की फसल, उत्पादन में भारी गिरावट

नई दिल्ली 12-May-2026 03:34 PM

झुलस गई जायद की फसल, उत्पादन में भारी गिरावट

(सभी तस्वीरें- हलधर)

अखिल भारतीय समन्वित कंदीय फसल परियोजना 
पीयूष शर्मा

जयपुर। बदलाव की यह कहानी है कि गुजरात बॉर्डर से सटे पहाड़ा गांव की। जो अब कंदीय फसलों का हब बन चुका है। इससे ना केवल किसानों के जीवन स्तर में बदलाव देखने को मिल रहा है। साथ ही, उनकी आर्थिक स्थिति में भी सुधार आ रहा है। इस बदलाव की नायक बनी है कृषक महिलाएं। जिन्होंने वैज्ञानिक ज्ञान को धरातल दिया और खेतों का हुलिया बदलने के साथ-साथ बीज बैंक  स्थापना की ओर कदम बढ़ा दिए है। गौरतलब है कि महाराणा प्रताप कृषि विश्वविद्यालय, उदयपुर ने अखिल भारतीय समन्वित कंदीय फसल परियोजना के तहत अनुसूचित जाति की महिला किसानों को कृषि आदान उपलब्ध कराया गया था। साथ ही, कंदीय फसल उत्पादन को लेकर उनका कौशल बढ़ाया गया। परिणाम रहा कि एक महिला ने करीब 40-42 हजार रूपए का शुद्ध मुनाफा कमाया है। बता दें कि उदयपुर संभाग सूरण, अरबी, शकरकंद और रतालू के उत्पादन में शुरू से ही अपनी पहचान रखता है। लेकिन, खेती के परम्परागत तौर-तरीकों के कारण किसानों को अपेक्षित फसलल उत्पादन नहीं मिल पाता। इस स्थिति को देखते हुए विश्वविद्यालय ने अनुसूचित जाति उपयोजना के तहत गुजरात से सटे गांव में पहाड़ा के किसानों को तकनीकी रूप से समृद्ध बनाने का फैसला लिया और अब परिणाम सबके सामने है। कंदीय परियोजना के प्रभारी डॉ. वीरेन्द्र सिंह ने बताया कि अनुसूचित जाति किसानों की आय बढाने में विश्वविद्यालय का प्रयास मिल का पत्थर साबित हुए है। इससे गांव मेें तकनीक का भी प्रयास हुआ है। किसान की आय में बढौत्तरी के साथ-साथ दूसरे किसानों को भी प्रोत्साहन मिला है। गौरतलब है कि विश्वविद्यालय में समन्वित परियोजना के तहत कंदीय फसलों पर रिसर्च कार्य हो रहा है। 

ऐसे समझे बदलाव
उन्होंने बताया कि अनुसूचित जाति उपयोजना के तहत 44 महिला किसानों को बैटरी ऑपरेटेड़ स्प्रेयर के साथ-साथ एक बीघा क्षेत्र के लिए रतालू, अरबी, सुरण और शकरकंद का 10-10 किलोग्राम बीज उपलब्ध कराया गया। साथ ही, कीट-रोग नियंत्रण के लिए कृषि रसायन उपलब्ध कराने के साथ-साथ कौशल विकास प्रशिक्षण भी दिया गया। समय-समय पर प्रक्षेत्र की मॉनीटरिंग की गई। 

42 हजार का मिला मुनाफा
उन्होंने बताया कि वैज्ञानिक तौर-तरीके से खेती करने से सूरण और रतालू का उत्पादन डेढ़ क्ंिवटल के करीब रहा। जबकि, अरबी का 130 किलो और शकरकंद का उत्पादन 2 क्ंिवटल रहा। किसानों ने रतालू 80 रूपए, सूरण 70 रूपए, अरबी 50 रूपए और शकरकंद 30 रूपए प्रति किलो के भाव से बिक्री किया। इससे बीघा भर जमीन से करीब 35 हजार रूपए की आय हुई। वही,इन फसलों से खाली हुए खेतों में मक्का की बुवाई करवाई गई। इससे करीब 4 क्विं टल प्रति बीघा का उत्पादन मिला। इससे करीब 8 हजार रूपए की आमदनी मिली। इससे एक कृ षक महिला को 42 हजार रूपए का शुद्ध लाभ मिला है।

लागत में  कमी 
बैटरी चलित स्प्रे मशीन से महिलाओं किसानों को काफी राहत मिली है। उनका कहना है कि इससे समय और शारीरिक श्रम की बचत हुई है। साथ ही, प्रति बीघा लगभग 1000 से 1500 रुपये की बचत हो रही है। बता दें कि वैज्ञानिक तरीके से ख्ेाती करने पर कंदीय फसलों से 15 गुणा उत्पादन मिलता है। वहीं, इन फसलों में रोग-कीट का ज्यादा प्रकोप नहीं होता है। 

पोषण का पावरहाउस
ग्राम की महिलाओं ने बताया की कंदीय फसलों से स्वास्थ्य लाभ प्राप्त हुए। क्योंकि, इनमे भरपूर मात्रा में विटामिन्स, रेशे, प्रोटीन्स, स्टार्च तथा विभिन प्रकार के पोषक तत्व पाए जाते है। साथ ही  गाँव के बच्चों के आहार में इन्हें शामिल करने से उनके ऊर्जा स्तर और शारीरिक विकास भी हो रहा है।

बीज बैंक की ओर कदम
पहाड़ा गाँव के किसान अब केवल खेती नहीं कर रहे। बल्कि, बीज के मामले में भी आत्मनिर्भर भी बन रहे है। क्योंिक, महिला किसान सुगना देवी, तेजस्वी, मगनी, रमीला, नारंगी, वशी, कांता, ममता, और गीता ने एक बीज बैंक स्थापित किया है। इससे गांव के अन्य किसानों को अब महंगी दर पर बीज खरीदने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ेगा। 


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