सितंबर की बारिश बढ़ाएगी सरसों की बुवाई, किसानों को मिलेगा बड़ा फायदा

नई दिल्ली 07-Sep-2026 04:52 PM

सितंबर की बारिश बढ़ाएगी सरसों की बुवाई, किसानों को मिलेगा बड़ा फायदा

(सभी तस्वीरें- हलधर)

मुख्य समाचार पाठ (बाईं ओर): जयपुर। सितम्बर शुरू होने के साथ ही खेत का सावनी छोड़ने वाले किसानों ने सरसों बुवाई की तैयारियां शुरू कर दी हैं। गौरतलब है कि भरतपुर, अलवर, दौसा, टोंक आदि जिलों में सरसों की अच्छी बुवाई होती है। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है लौटते मानसून की अच्छी बरसात उत्पादक जिलों में सरसों बुवाई का क्षेत्रफल बढ़ा सकती है। हालांकि, प्रदेश में मानसून की बारिश सामान्य से 21 फीसदी तक कम हुई है। लेकिन, इन दिनों दक्षिणी-पूर्वी राजस्थान में जारी बारिश के दौर से सरसों की बुवाई करने वाले किसानों को लाभ मिलने की उम्मीद है। बता दें कि सरसों ऐसी फसल है, जिसे सिंचाई की कम जरूरत होती है।

कृषि विभाग ने शुरू तैयारियां 

उधर, कृषि विभाग ने भी रबी फसलों को लेकर आवश्यक तैयारियां शुरू कर दी हैं। विभाग स्तर पर कृषि आदान की व्यवस्थाएं जुटाएं जाने लगी है। साथ ही, सरसों की बुवाई करने वाले किसानों को एसएसपी खाद उपयोग के लिए प्रोत्साहित किया जाने लगा है। गौरतलब है कि प्रदेश में 30-35 लाख हैक्टेयर क्षेत्र में सरसों की बुवाई होती है।

मानसून भी देगा साथ 

उधर, प्रदेश में मानसून की बारिश का दौर 12 सितम्बर के बाद भी जारी रहने की संभावना है। यूरोपीय मध्यम-अवधि मौसम पूर्वानुमान केंद्र के अनुमान के मुताबिक, गुजरात, दक्षिण-पूर्वी राजस्थान, पश्चिमी मध्य प्रदेश, आसपास के पश्चिमी तट और पूर्वी भारत के कुछ हिस्सों में 12 सितंबर तक मानसून सक्रिय रह सकता है। यदि ऐसा होता है तो सरसों की बुवाई करने वाले किसानों के लिए सोने पे सुहागा जैसी स्थिति तैयार हो जायेगी। क्योंकि, बारानी खेती करने वाले किसान सितम्बर के अंतिम सप्ताह से सरसों बुवाई शुरू कर देते हैं। इस स्थिति में प्रदेश में सरसों बुवाई का क्षेत्र बढ़ने की संभावना है।

सल्फर और कैल्शियम की जरूरत 

सरसों तिलहनी फसल होने के कारण इसमें सल्फर और कैल्शियम की विशेष आवश्यकता होती है। सरसों में सिंगल सुपर फास्फेट यानी एसएसपी का उपयोग उपयोगी हो सकता है, क्योंकि इसमें फास्फोरस के साथ सल्फर और कैल्शियम भी उपलब्ध होता है। वहीं डीएपी से मुख्य रूप से नाइट्रोजन और फास्फोरस मिलता है, जबकि यूरिया में केवल नाइट्रोजन होती है।

इन संकेतों पर नजर 

मौसम वैज्ञानिकों की नजर अब उत्तर-पश्चिम भारत पर है। मध्य प्रदेश का सिस्टम कमजोर होने के बाद अगर मानसूनी द्रोणी दक्षिण-पूर्व की ओर खिसकती है, तो मानसून वापसी के संकेत मिलना शुरू हो जायेंगे। लेकिन अगर द्रोणी उत्तर भारत में ही बनी रहती है अथवा बंगाल की खाड़ी में नया निम्न दबाव क्षेत्र बनता है, तो बारिश का दौर आगे भी जारी रह सकता है।

 


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