थार का काला सोना साजी: बंजर ज़मीन से लाखों की कमाई
(सभी तस्वीरें- हलधर)पीयूष शर्मा
जयपुर। थार में साजी का उदय नई संभावनाओं को जन्म दें रहा है। बेहत्तर भाव के चलते किसान झाड़ीनुमा इस पौधें की व्यवसायिक खेती करने लगे है। क्योंकि, पापड़ उद्योग की मांग और पाकिस्तान खार पर 200 फीसदी आयात शुल्क के चलते घरेलू बाजार में इसके दाम 150 से 180 रूपए प्रति किलो तक जा पहुंचे है। इससे साजी किसानों के लिए काला सोना बन चुकी है। कृषि वैज्ञानिकों का कहना कि साजी को लेकर किसानों का बढ़ता रूझान देश को आत्मनिर्भरता के साथ-साथ निर्यात की स्थिति में ला सकता है। उल्लेखनीय है कि साजी को पापड़ उद्योग की जान कहा जाता है। क्योंकि, इसके बिना पापड़ और भुजिया का जायका बन ही नहीं पाता । कृषि वैज्ञानिकों ने बताया कि साजी एक प्रकार की रेगिस्तानी झाड़ी है जो पाकिस्तान के कुछ हिस्सों सहित मध्य एशिया के शुष्क क्षेत्रों में पायी जाती है। उन्होंने बताया कि पुलवामा हमले से पहले साजी 30 से 40 रूपए प्रति किलो की दर से उपलब्ध हो जाती थी। अधिकांश साजी का आयात पाकिस्तान के सिंध प्रांत से किया जाता था। लेकिन, हमले के बाद सरकार ने आयात शुल्क बढ़ाकर 200 फीसदी कर दिया। इससे घरेलू बाजार में इसके दाम 150 से 180 रूपए प्रति किलो तक पहुंच चुके है। यही कारण है कि बीकानेर आस-पास क्षेत्र में किसान इसकी व्यवसायिक खेती करने लगे है। किसानों का कहना है कि प्राकृतिक रूप से उगने वाली इस झाड़ी के बीज का सहेजकर रखना होता है और खेत में बिखेरना होता है। इसके बाद कोई देखरेख की जरूरत नहीं होती है। डेढ़ से दो महीने में उत्पादन मिलना शुरू हो जाता है। बता दें कि इस पौधे का उपयोग ईंधन, निर्माण सामग्री, पारंपरिक चिकित्सा में के साथ-साथ भोजन घटक के रूप में भी उपयोग किया जाता रहा है।
साजी जैसा जायका नहीं
पाकिस्तानी साजी पर आयात शुल्क बढने के बाद पापड़ तैयार करने में विकल्प के तौर पर समुद्री खार का उपयोग करके भी देखा गया। लेकिन, मोठ-उड़द के पापड़ में साजी जैसा जायका नहीं बन पाया। इस स्थिति ने बाजार में साजी की मांग बढ़ा दी। जिससे बाजार में साजी के दाम 150 रूपए प्रति किलो से अधिक हो चले है।
बंजर, लवणीय भूमि से आय
एसकेआरएयू बीकानेर में साजी प्रोजेक्ट के पूर्व प्रभारी डॉ. प्रमेन्द्र सिंह चौहान ने बताया कि बंजर, लवणीय और अनुपयोगी भूमि में साजी का आसानी से उत्पादन लिया जा सकता है। बरसात में बीज बिखेरने के डेढ-दो महीने बाद खेतों में साजी़े नजर आने लग जाती हैं। जिससे बंजर जमीन पर हरियाली के साथ-साथ आय प्राप्त की जा सकती है।

खार में ज्यादा उत्पादन
उन्होने बताया कि लवणीय और अनउपजाऊ जमीन पर साजी की खेती करना सबसे फायदेमंद रहता है, जिस जमीन में जितनी अधिक लवणीय मात्रा होगी साजी उतना अधिक पैदावार देगी। एक बार बुवाई के बाद 5 से 10 साल तक इसकी फसल ली जा सकती हैं।
इसलिए कहते है काला सोना
उन्होने बताया कि इस पौधे को सुखाकर जलाया जाता है, जिससे इसका रस टपककर कोयले जैसा हो जाता है, जो बाद में काले पत्थर के रूप में बदल जाता है। जिसका उपयोग पापड़ बनाने में किया जाता है। गौरतलब है कि साजी का पौधा जिस भूमि पर लगातार दो-तीन साल उग जाता है, उसे उपजाऊ बना देता है। यह पौधा लवणीय और पक्की भूमि पर ही उगता है। पौधा भूमि से नमक को सोखकर अपनी बढ़वार करता है। ऐसे में भूमि से लवण की मात्रा कम हो जाती है और खेती योग्य भूमि हो जाती है। साजी का पौधा कड़वा होने से इसे अधिकतर पशु भी नहीं खाता हैं।
ऐसे बनता है जायका
उन्होने बताया कि काले पत्थर को ग्राइंडर में प्रोसेस किया जाता है और बाद में इसका पानी निकाला जाता है, इसके अर्क को पापड़ गूंथने के लिए पानी में मिलाया जाता हैं। खार का उपयोग करके पापड़ों को सूखाने का समय भी कम हो जाता है, क्योंकि साजी का उपयोग करने से धूप में सूखाने की गति तेज होती हैं। पापड़ों को बनाने के लिए धूप में सुखाया जाता हैं, जिसमें यह खूब अच्छी तरह से सुख जाती है। धूप की मदद से पापड़ अधिक ठोस और सुखे होते हैं। खार से पापड़ कई दिन तक खराब नहीं होते। साथ ही खाने वाले का हाजमा ठीक रहता है।
