पॉलीथिन चरने वाली मशीन बन गई गाय
(सभी तस्वीरें- हलधर)पीयूष शर्मा
जयपुर। गाय अब पॉलीथिन चरने वाली मशीन बन चुकी है। हालात, यह हो चले ही भूख-प्यास के चलते गाय कूड़ा चर रही है। इससे शासन-प्रशासन पर तो सवालिया निशान खड़ा हो रहा है। वहीं, देसी गायों की अकाल मौत का बड़ा कारण भी प्लास्टिक बनता जा रहा है। इससे पाइका रोग को भी बढ़ावा मिल रहा है। पशुपालन विशेषज्ञों का कहना है कि गंदगी के ढेर से भूख मिटाने वाली गायों को हम स्वस्थ नहीं कह सकते। क्योंकि, उसकी भूख और पोषक तत्वों की कमी ही उसे कूड़े के ढेर तक खींच कर लाई है। इसके चलते हालात ये हो चले है कि पवित्र गाय का पेट कूड़ेदान में तब्दील हो चुका है। साथ ही, माइक्रो प्लास्टिक उसका जीवन खत्म कर रहा है। गौरतलब है कि फास्फोरस, सोडियम, आयरन आदि पोषक तत्वों की कमी होने से दुधारू पशुओं में पाइका रोग हो जाता है। इस रोग का उपचार संतुलित पोषक आहार ही है। पशु चिकित्सकों का कहना है कि पाइका रोग होने के बाद ही पशु अपशिष्ट पदार्थ खाने लगता है। घरेलू पशुधन से ज्यादा खतरनाक स्थिति छुट्टा पशुओं की है। क्योंकि, इनका पेट चारे के अभाव में पॉलीथिन का गोदाम बन चुका होता है। माइक्रो प्लास्टिक कण इनकी आंतो से चिपक कर पाचन तंत्र को प्रभावित करना शुरू करते है और समय पर उपचार के अभाव में गाय दम तोड़ देती है। ऐसे में जरूरी है कि परिड़ा अभियान के जैसे ही जनभागीदारी से सडक़ो पर विचरण करने वाली गायों का जीवन बचाने के लिए भी पहल की जाएं।
शासन भी कम दोषी नहीं
गौ संरक्षण और संवद्र्धन के लिए सरकार गौशालाओं को अनुदान मुहैया करवा रही है। प्रतिदिन बड़े गौवंश के लिए 50 रूपए और छोटे गौवंश के लिए 25 रूपए की दर से अनुदान दिया जाता है। लेकिन, अनुदान का लाभ उन गौशालाओं को मिल रहा है, जो गौपालन विभाग के मापदंड़ो को पूरा कर रही है। गौशला अनुदान को लेकर विधानसभा में सरकार द्वारा दिए व्यक्तव्य के अनुसार जिन गौशालाओं में 100 की संख्या में गौवंश है, वहीं, अनुदान के पात्र होंगे। ऐसे में सरकार की कथनी और करनी में अंतर आसानी से समझा जा सकता है। यानी, 100 से कम संख्या वाला गौवंश सरकार की नजर में गौवंश ही नहीं है? शायद यही कारण है कि खुला विचरण करने वाला गौवंश बेमौत मर रहा है।
सर्वव्यापी प्लास्टिक बैग
प्लास्टिक बैग पर्यावरण, मानव और पशु अधिकारों का घोर उल्लंघन हैं। लेकिन, प्लास्टिक बैग पर पूर्ण प्रतिबंध के लिए एक भी कड़ा कानून अब तक नहीं बना है। शायद यही कारण है कि सडक़, रेलवे ट्रेक, नदी-नाले प्लास्टिक से अटे नजर आते है। यानी प्लास्टिक बैग गौवंश के सामूहिक विनाश के हथियार बन चुके है।
क्यों होता है पाइका रोग
ज्यादा पैदावार के लालच में किसान नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटेशियम की भी सही मात्रा का खेतों में उपयोग नहीं कर रहे हैं। इससे चारे में फॉस्फोरस की मात्रा भी प्रभावित हो रही है। कमी को पूरा करने के लिए पशु ऐसी अखाद्य वस्तुओं को खाने की इच्छा जाहिर करते है, जिन्हें आहार नहीं कहा जा सकता इसी स्थिति को पाईका कहते है।
ऐसे पहचाने पोषकता की कमी
पाइका रोग होने पर गाय-भैंस कागज, कपड़ा, मिट्टी, पॉलीथिन और अपने ही गोबर को खाने लगते हैं। बराबर वाले पशु के शरीर को चाटने लगते हैं। मुर्दा जानवर और उनकी हड्डी खाने लगते हैं। पशु जब भी ऐसा करे तो समझ जाएं कि पशु गंभीर बीमारी की चपेट में आ चुका है। इसे एलोट्रओफेजिया यानि पाइका कहते हैं।
यूं करे उपचार
पशुपालन विशेषज्ञ डॉ. योगेश आर्य ने बताया कि पशु चिकित्सक की सलाह पर पशुओं को कम से कम पांच दिन तक फॉस्फोरस का टीका लगवाएं। पशुओं को प्रतिदिन 50 ग्राम सोडाफास पाउडर खाने में दें। विटामिन ए और विटामिन बी कॉम्पलेक्स भी दें। पेट के कीड़ों की दवा पीलाएं। पानी अथवा बांट में सादा नमक पिलाएं। खनिज लवणों युक्त चारा खिलाएं।