पशु जैव विविधतासंरक्षण की चुनौती

नई दिल्ली 15-Dec-2025 03:12 PM

पशु जैव विविधतासंरक्षण की चुनौती

(सभी तस्वीरें- हलधर)

राजस्थान, जिसे अक्सर किलों, महलों और रंगीन संस्कृति की भूमि के रूप में देखा जाता है। एक अनूठी और मूल्यवान पशु जैव विविधता का भी घर है। राज्य का विस्तृत भौगोलिक परिदृश्य, जिसमें विशाल थार मरुस्थल, प्राचीन अरावली पर्वत श्रृंखला और पूर्वी हिस्से की आद्र्रभूमियाँ शामिल है। इसे भारत के सबसे महत्वपूर्ण और विविध पारिस्थितिक क्षेत्रों में से एक बनाता है। यह भौगोलिक विविधता विभिन्न प्रकार के पारिस्थितिक तंत्रों को जन्म देती है, जो अनेक दुर्लभ और स्थानिक प्रजातियों को आश्रय देते हैं।

अद्भुत पशु संपदा 

राजस्थान की पशु जैव विविधता को तीन प्रमुख प्राकृतिक आवासों में विभाजित किया जा सकता हैए जिनमें विशिष्ट प्रजातियाँ पाई जाती है...

मरुस्थलीय गौरव-थार रेगिस्तान कठोर जलवायु के लिए अनुकूलित जीवों का निवास स्थान है। यहाँ का सबसे प्रतिष्ठित जीव ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (गोडावण) है, जो राज्य पक्षी होने के बावजूद गंभीर रूप से लुप्तप्राय है। अन्य महत्वपूर्ण प्रजातियों में फु र्तीला चिंकारा, विशिष्ट मरु लोमड़ी और दुर्लभ काला हिरण शामिल हैं। जिनका संरक्षण बिश्नोई समुदाय द्वारा सदियों से किया जाता रहा है।

अरावली की जीवन रेखा-अरावली की पहाडयि़ाँ और उनके आसपास के जंगल शिकारियों का महत्वपूर्ण निवास स्थल हैं। रणथंभौर और सरिस्का टाइगर रिजर्व में बाघ की बढ़ती संख्या इस क्षेत्र के संरक्षण प्रयासों की सफलता को दर्शाती है। यहाँ तेंदुआ,  सांभर सबसे बड़ा भारतीय हिरण और दक्षिणी क्षेत्रों में उडऩे वाली गिलहरी भी पाई जाती हैं।

आद्र्रभूमि का स्वर्ग -भरतपुर का विश्व प्रसिद्ध केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान एक महत्वपूर्ण आद्र्रभूमि  है, जो हजारों प्रवासी पक्षियों, विशेष रूप से विलुप्त हो चुकी साइबेरियन क्रेन, हालांकि अब कम दिखती है और अन्य जल पक्षियों के लिए एक स्वर्ग है।

संरक्षण का महत्व 

पशु जैव विविधता का संरक्षण राजस्थान के भविष्य और स्थिरता के लिए अपरिहार्य है।

आर्थिक और पर्यटन लाभ

राजस्थान की पशु जैव विविधता पर्यावरण पर्यटन का आधार है। रणथंभौर के बाघ और केवलादेव के पक्षी हर साल लाखों राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। यह पर्यटन राज्य के लिए महत्वपूर्ण राजस्व, विदेशी मुद्रा और स्थानीय लोगों के लिए रोजगार का सृजन करता है। वन्यजीवों का संरक्षण सीधे तौर पर एक मजबूत स्थानीय अर्थव्यवस्था का समर्थन करता है।

सांस्कृतिक और आनुवंशिक मूल्य

बिश्नोई समुदाय की तरह, राजस्थान में वन्यजीवों के संरक्षण की एक गहरी सांस्कृतिक परंपरा रही है। इसके अलावा, यहाँ की स्थानीय पशुधन नस्लें जैसे थारपारकर और राठी गायए शुष्क परिस्थितियों में अद्भुत अनुकूलन दर्शाती हैं। यह नस्लें आनुवंशिक विविधता का महत्वपूर्ण भंडार हैं, जो भविष्य में बीमारियों या चरम जलवायु परिस्थितियों का सामना करने के लिए आवश्यक हो सकती हैं। 

संरक्षण की चुनौति 

राजस्थान की जैव विविधता को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा हैए जिसमें मानव.पशु संघर्ष, आवासों का विनाश और अवैध शिकार प्रमुख हैं। गोडावण के लिए हाईटेंशन बिजली की तारें घातक सिद्ध हो रही हैं और खनन गतिविधियाँ वन्यजीव गलियारों को बाधित कर रही हैं। इन चुनौतियों का सामना करने के लिए, राज्य ने कई सकारात्मक कदम उठाए हैं जैसे प्रोजेक्ट टाइगर का विस्तार, बाघों के लिए नए कॉरिडोर और मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व जैसे नए संरक्षित क्षेत्र अधिसूचित किए गए हैं।  गोडावण के लिए विशेष प्रजनन कार्यक्रम और उनके आवास के आसपास बिजली के तारों को भूमिगत करने की योजनाएँ कार्यान्वित की जा रही हैं। इसके अलावा स्थानीय समुदायों को शामिल कर वन सुरक्षा और प्रबंधन समितियाँ बनाई गई हैं, जो वन क्षेत्रों की निगरानी में सक्रिय भागीदारी निभाती हैं।

राजस्थान की पशु जैव विविधता केवल वन्यजीवों का एक संग्रह नहीं है। बल्कि, यह राज्य की प्राकृतिक विरासत और उसके पारिस्थितिकीय स्वास्थ्य का प्रतीक है। इस अमूल्य संपदा का संरक्षण सुनिश्चित करने के लिए सरकार, गैरसरकारी संगठनों और सबसे महत्वपूर्ण, प्रत्येक नागरिक की सक्रिय भागीदारी अनिवार्य है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि विकास और वन्यजीव संरक्षण एक दूसरे के पूरक बनें। ताकि, राजस्थान हमेशा अपनी प्राकृतिक भव्यता पर गर्व कर सके।

डॉ. नरसी राम गुर्जर, राजूवास, बीकानेर।


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सूखे और मोटे चारे की उपयोगिता

डॉ. अनिल कुमार लिम्बा, पशु चिकित्सा अधिकारी, पांचोडी, नागौर देश में उत्तम कोटि की पशुधन सम्पदा है। लेकिन, पौष्टिक पशु आहार का अभाव होने के कारण प्रति पशु दूध, मांस आदि की उत्पादकता अत्यन्त कम है। प्राकृतिक आपदाओं के कारण पशुओं की आवश्यकता के अनुसार उसी अनुपात में हरे चारे की पैदावर सम्भव नहीं हो पा रही है। विशेषकर राजस्थान जैसे प्रान्त जहां अकाल से प्रभावित क्षेत्र सर्वाधिक है। जिसकी वजह से राज्य का पशुधन और उसकी उत्पादकता प्रभावित होती है। भयंकर सूखे की स्थिति में यहां का पशुधन दूसरे राज्यों में पलायन तक कर जाता है या फिर चारे के अभाव में मृत्यु का शिकार हो जाता है।