कृत्रिम गर्भाधान से बढ़ेगा पशुओं का दूध, जानें फायदे और सही समय

नई दिल्ली 04-Sep-2026 12:51 PM

कृत्रिम गर्भाधान से बढ़ेगा पशुओं का दूध, जानें फायदे और सही समय

(सभी तस्वीरें- हलधर)

पशुओं से अधिक आर्थिक लाभ प्राप्त करना उनकी नस्ल और उनकी मूल क्षमता पर निर्भर करता है। इसलिए पशु विकास हेतु नस्ल सुधार कार्य को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है। कृत्रिम विधि से नर पशु से वीर्य एकत्रित करके मादा पशु के प्रजनन अंगों में रखने की प्रक्रिया को कृत्रिम गर्भाधान कहते हैं। हमारे देश में कृत्रिम गर्भाधान को गाय और भैंस में बड़े पैमाने पर अपनाया जा रहा है। इससे पशुओं में नस्ल सुधार तो हो ही रहा है। साथ ही आने वाली संतति में दूध उत्पादन में भी बढ़ोतरी होगी।

कृत्रिम गर्भाधान के लाभ

  • कृत्रिम गर्भाधान से कम दूध देने वाली नस्लों को उन्नत नस्ल के सांड के वीर्य से गर्भाधान करवाने से उससे उत्पन्न होने वाली संतति निःसंदेह ही अधिक दूध उत्पादन वाली होगी।

  • इस विधि से एक सांड से एक बार में एकत्रित किए गए वीर्य से बहुत सारे मादा पशुओं को गर्भाभिन कर सकते हैं। इसलिए प्रत्येक पशुपालक को उन्नत नस्ल का सांड रखने की आवश्यकता नहीं होगी।

  • कृत्रिम गर्भाधान के लिए इस्तेमाल होने वाले वीर्य में एंटीबायोटिक मिलाते हैं, जिसकी वजह से मादा पशुओं में जननांगों में संक्रमण की संभावना नहीं रहती है।

  • जिस तरह से कृषि के क्षेत्र में हरित क्रांति आयी है, उसी तरह से हम श्वेत क्रांति की तरफ बढ़कर अधिक दूध उत्पादन करके कुपोषण को बहुत हद तक दूर कर सकते हैं और पशुपालकों का आर्थिक उत्थान कर सकते हैं।

  • इस विधि द्वारा वीर्य को हम अपनी जरूरत के मुताबिक कहीं भी, किसी भी समय ले जा सकते हैं एवं आवश्यकतानुसार उपयोग में ले सकते हैं। साथ ही तरल नत्रजन में वीर्य को वर्षों तक सुरक्षित रख सकते हैं।

  • कई आधुनिक तकनीकों जैसे कि सिंक्रोनाइजेशन का उपयोग कर काफी संख्या में मादाओं को एक ही समय में ताव में लाया जा सकता है। और इन पशुओं को केवल कृत्रिम गर्भाधान के द्वारा आसानी से एक साथ ग्याभिन किया जा सकता है।

  • अपंग मादाओं में कृत्रिम गर्भाधान ही ग्याभिन करने की उपयुक्त तकनीक है।

  • प्रजनन संबंधी रिकार्ड को व्यवस्थित और लिखित में रखा जा सकता है। सालभर के प्रजनन को फायदे के हिसाब से योजनाबद्ध किया जा सकता है।

कृत्रिम गर्भाधान - शंका और समाधान

कृत्रिम गर्भाधान के विषय में लोगों को शंका रहती है कि पशु ग्याभिन नहीं होते हैं। लेकिन, ऐसी बात नहीं है। यदि पशु का कृत्रिम गर्भाधान सही समय पर करवाया जाए और वीर्य उच्च गुणवत्ता का है तो पशु के ग्याभिन होने की संभावना अधिक रहेगी। पशु के ग्याभिन न रहने के मुख्यतया निम्न कारण हो सकते हैं-

  • सही समय पर एआई न कराना: इसके लिए भारतीय नस्ल के गाय भैंसों में पशु के ताव में आने के 12 से 18 घंटे के बीच यानि पशु यदि सुबह के समय ताव में आया है तो उसे शाम के समय और यदि शाम को ताव में आया है तो अगले दिन सुबह ग्याभिन कराना चाहिए। संकर नस्ल की गायों में ताव में आने से 24-30 घण्टे बाद कृत्रिम गर्भाधान कराना चाहिए। बहुत से पशुपालकों की शिकायत रहती है कि उनका पशु जब ताव में होता है तो वह सभी चिन्ह जैसे रंभाना आदि ठीक तरह से प्रकट नहीं करते, जिसकी वजह से पता नहीं चलता कि पशु कब ताव में है। बहुत से पशु इस तरह के चिन्ह प्रकट नहीं करते मगर रंभाने के अलावा बाकी सभी चिन्ह जैसे पेशाब के रास्ते चिपचिपाहाट वाला स्राव आना, बार-बार पेशाब करना, पशु का बेचैन रहना आदि प्रकट करते हैं। जिन्हें देखकर यह पता लगाया जा सकता है कि पशु अब ताव में है।

  • जननांगों में संक्रमण होना: यदि मादा पशु के जननांगों में किसी भी प्रकार का संक्रमण है तो भी पशु ग्याभिन नहीं रह पाता। बच्चेदानी में संक्रमण ज्यादातर गाय अथवा भैंस को गांवों में पाए जाने वाले सांड से ग्याभिन कराने से हो सकता है। यदि सांड पहले से ही रोगग्रस्त हो तो ये रोग को अन्य गाय-भैंस में फैला सकते हैं। इसलिए गाय भैंस के ताव में आने पर उसे कृत्रिम गर्भाधान केन्द्र पर ले जाना चाहिए। क्योंकि, सांड से ग्याभिन कराने पर मादा पशु में रोग हो सकता है और आने वाली संतति भी उन्नत नस्ल की नहीं होगी। फिर भी यदि गाय के जननांगों में रोग किसी कारण से हो ही जाता है और यदि रोग मामूली है तो पशु को ग्याभिन न करवा कर कुशल पशुचिकित्सक द्वारा मादा पशु के प्रजनन अंगों में एंटीबायोटिक दवा डलवानी चाहिए और उनके निर्देशानुसार उपचार करवाकर जब पशु अगली बार गर्मी में आये तो ग्याभिन करवाना चाहिए। यदि रोग की तीव्रता ज्यादा है तो उस पशु के प्रजनन अंगों में लगातार तीन अथवा चार बार तक एंटीबायोटिक दवाई डलवानी चाहिए। फिर अगली बार पशु के गर्म होने पर उसे ग्याभिन करवाना चाहिये। इसके अलावा कभी-कभी इस्तेमाल किए जाने वाला वीर्य भी अच्छी गुणवत्ता का नहीं होता, जिसकी वजह से भी पशु ग्याभिन नहीं रह पाता। साथ ही, पशु को ग्याभिन करने वाले विशेषज्ञ को भी कृत्रिम गर्भाधान करते समय काफी सतर्क रहना चाहिए। उसे उसी स्थिति में पशु को ग्याभिन कराना चाहिए, जब पशु ठीक तरह से ताव में हो और वीर्य भी उच्च कोटि का हो।

  • वर्तमान में सेक्स सॉर्टेड सीमन की उपलब्धता से पशुपालकों को अपने पशु से मादा वत्स मिलने की संभावना बढ़ गयी है। सेक्स सॉर्टेड सीमन तकनीक में प्रयोगशाला में वीर्य से एक्स शुक्राणु को वाई शुक्राणु से पृथक किया जाता है। कृत्रिम गर्भाधान के दौरान एक्स शुक्राणुओं वाले सीमन से भी मादा पशु का गर्भाधान करते हैं, जिससे कि अधिक से अधिक एक्स शुक्राणु ही मादा पशु के अंडे को निषेचित कर सके। सेक्स सॉर्टेड सीमन से मादा वत्स होने की संभावना बढ़ जाती है।

  • पशुपालक उपरोक्त लिखित बातों का ध्यान रखें जैसे पशु के ताव में होने पर उसकी पहचान कर उचित समय पर पशु को ग्याभिन कराने के लिए ले जाना और यह देखना कि उनका पशु कोई असामान्य तरह का स्राव तो नहीं डाल रहा है। यदि ऐसा है तो उसका इलाज करवाना आवश्यक है। इसके अलावा पशु को संतुलित आहार, खनिज मिश्रण और नमक देना अति आवश्यक है, जिससे उसके जनन अंगों की वृद्धि ठीक तरह से हो सके। क्योंकि ऐसा देखा गया है कि पशु की बच्चेदानी की वृद्धि ठीक तरह से नहीं हो पाती और पशु ग्याभिन नहीं रह पाता। यदि इन सभी बातों पर ध्यान दिया जाए तो पशु अवश्य ही ग्याभिन होगा। उससे आने वाली संतति अधिक दूध देगी। साथ ही, वर्तमान में उपलब्ध सेक्स सॉर्टेड सीमन का उपयोग कर अपने पशु से मादा वत्स प्राप्त कर सकते हैं और अपने डेयरी व्यवसाय को आर्थिक उन्नति की ओर अग्रसर कर सकते हैं।

डॉ अतुल शंकर अरोड़ा, पशु विज्ञान केंद्र, कोटा

 


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